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देसी मामी
11-29-2012, 03:59 AM
Post: #1
देसी मामी
भाग १
जबसे उसने सुना की महेश आ रहा है, वो बड़ी खुश थी. तरह तरह के पकवान बनाने में सबेरे से जुटी थी. शादी के बाद पति चंदर के साथ शहर आ गयी थी. शहर भी कह नहीं सकते थे उसे. मुंबई के पास एक नवी मुंबई शहर बन रहा था. नए शहर में काफी बिल्डिंगें बन रही थी. चंदर एक कोन्त्रक्टोर के यहाँ सूपरवाइज़र था. तनख्वाह ठीक ठाक थी. बेटी तारा के जन्म के बाद चंदर ने नसबंदी करा ली थी. वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था, परन्तु समझदार था. शादी के बाद जब तक की उसकी आमदनी नहीं बढ़ी उसने कोप्पर-टी का प्रयोग करवाया था. तारा शादी के चार साल बाद जन्मी थी.

दोपहर में घर काटने को दौड़ता था. पड़ोस की औरतों से वो घुल मिल नहीं पायी थी. पति और बच्ची ही उसका सारा संसार थे. उनके एक रिश्तेदार थे मुंबई में. लेकिन शहर की भाग-दौड में उनसे भी महीनों में कभी मिल पाते थे. चंदर ने उसे एक मोबाइल फोन दिया हुआ था जिससे की वो गांव में जब रहा नहीं जाता, कॉल कर लेती थी. लेकिन वो भी उसके अकेलेपन को काटने के लिए काफी नहीं था. ऐसे में कल शाम चंदर ने उसे बताया की महेश आ रहा है. उसे काफी खुशी हुई की चलो उसे भी बतियाने के लिए कोई मिल जायेगा, कुछ दिन तो मन लगा रहेगा!

महेश चंदर की सगी दीदी का लड़का यानी की उनका भांजा था. उसे याद था जब उनका विवाह हुआ था

बहुत गोरा, बिखरे बाल और मोती मोती आँखें. बहुत शर्मीला था. मोटा होने के कारण बिलकुल किसी गुड्डे की तरह दीखता था. वो शादी के लिए तैयार हो रही थी तो दीदी के साथ वो भी उसके कमरे में आया था. तब वो शर्माता हुआ दीदी के पीछे छुप रहा था. दीदी झल्लाते हुए बोली,
"अरे महेश क्या कर रहे हो, मामी हैं तुम्हारी. चलो नमस्ते कहो... जल्दी नमस्ते बोलो नहीं तो मामी को बुरा लगेगा."
"नहीं दीदी बुरा क्यों लगेगा. यह गोलू तो अपनी मामी को एक पप्पी देगा. देगा न गोलू?"
फिर उसने महेश के गाल खींच के उसे एक गाल में पप्पी दे दी. वो शर्मा के कमरे से भाग गया था!

उसके बाद भी कई दफा वो उससे मिली थी. हमेश उसे छेडा करती थी और गाल पे पप्पी देने के बाद उसे हलके से काट देती, जिससे वो रोने लगता. फिर उसे चोकलेट और टोफी का लालच दे दे के मनाती.

एक बार उसने बड़े ही भोलेपन से सबके सामने कहा था,
"चंदा मामी कितनी सुन्दर हैं. मैं बड़ा हो जाऊँगा तो सिर्फ चंदा मामी से शादी करूँगा."
हँसते हँसते सब के पेट में बल पड़ गए थे और सब के चेहरे लाल हो गए थे.

वो प्यारा शर्मीला मामी का चहेता गोलू उनके पास कुछ दिनों के लिए आ रहा था, कुछ काम था उसे. चंदर ने बताया तो था, लेकिन उसके आने की खबर की खुशी में उसने ध्यान नहीं दिया था. बस पुछा था कि कितने दिन रहेगा तो पता चला कि करीब पन्द्रह दिन रहेगा उनके पास. लाडले भांजे के स्वागत कि तैयारी में लग गयी.


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11-29-2012, 03:59 AM
Post: #2
RE: देसी मामी
भाग २
महेश के आने का वक्त हो रहा था. चंदर लेने गए थे उसे. वो भी जाना चाहती थी लेकिन ट्रेन रात को देर से आने वाली थी. लौटते-लौटते १२ बज जाते. वो बोले कि तुम्हें साथ नहीं ले जा सकता. वो समझती थी. बरसात शुरू होने वाली थी और जिस बिल्डिंग का काम चंदर देख रहा था वो बीच में कुछ कारण से रुक गया था. अब जब काम फिर शुरू हुआ तो बिल्डर चाहता था कि बरसात से पहले बिल्डिंग कड़ी हो जाए क्योंकि फिर बरसात में ज्यादा काम नहीं हो पाता. इस कारण काम २४ घंटे चलता और चंदर कई बार रात-रात भर काम करते.

एक महीना भर था बरसात शुरू होने में.

खैर, दरवाज़े पे टकटकी लगाये बैठी थी. तारा खाना खा कर सो रही थी. नींद उसे भी आ रही थी, लेकिन भांजे को खिला-पिला के ही सोने वाली थी वो.

तभी दरवाज़े में चाभी घूमी और दरवाज़ा खुला, चंदर एक बड़ा सा बैग उठाए घर में घुसे. वो उठ के उनसे बैग लेने बढ़ी. बैग हाथ में लेते ही, चंदर के पीछे जह्न्कने लगी, वहाँ कोई नहीं था.
"बैग ले आये, भांजे को कहाँ छोड़ आये?"
"अरे आ रहा है, थोड़ी देर पहले बोलने लगा, 'मामा, पेशाब करके आता हूँ!'. मैंने कहा घर तो आ ही गया है, घर में कर लेना. पर बोलता है..." चंदर हसने लगे, "... बोलता है, एक सेकंड कि और देर हो गयी तो पैंट में हो जायेगी. मामी के सोचेंगी?"

सुन कर वो भी हसने लगी.
"तुम खाना परोसो, तब तक वो आ जायेगा, मैं भी हाथ पैर धो लेता हूँ."

बैग को एक कुर्सी के बगल में रख कर वो रसोई घर चली गयी और दोनों कि थालियाँ लगाने लगी.

"चंदर मामा!", उसने जब यह आवाज़ सुनी तो एक पल के लिए वो अटक गई. यह तो किसी वयस्क पुरुष कि आवाज़ थी. वो बाहर आई तो उसने देखा कि एक लंबा सा, पतला सा लड़का था. उसकी हलकी हलकी मूंछे थी. दाढ़ी अभी ठीक से नहीं आई थी. उसे देखते ही वो मुस्कुराया और उसके पैर छूने के लिए झुक गया.

"अरे मामी के पैर नहीं छूते बेटा. कितना बड़ा हो गया है तू तो. कितने साल का हो गया रे?"
"18 साल का, मामी, हमेशा गोलू बच्चा थोड़ी न रहूँगा!" वो उठते हुए बोला.
"धत तेरी की! अब गाल किसके नोचुंगी?"
"मेरे तो नहीं नोच पाओगी!" वो हँसते हँसते बोला.

"हो गया मामी भांजे का मेल मिलाप तो खाना खा लें?" चंदर हाथ पैर धो चुके थे.
"मैं तो पहले नहाऊंगा मामा."
"अरे हाँथ-पैर धो के खाना खा लो, कल नहा लेना. थक गए होगे, जल्दी सो जाओ", चंदा बोली.
"भूख तो तेज लगी है लेकिन नहाये बिना नहीं रहा जायेगा. पांच मिनट में नहा के आता हूँ.", बोलते हुए महेश ने बैग खोला और उसमे से तौलिया और कुछ कपडे ले बाथरूम कि और चल दिया.

घर बहुत बड़ा नहीं था उनका. एक बिल्डिंग के तीसरी और आखरी मंजिल पर उनका घर था. एक बेडरूम, एक हॉल और एक किचन. पति पत्नी और बेटी तीनों एक ही कमरे में सोते थे. महेश के लिए उसने एक गद्दा निकल दिया था. उसी को हॉल में बिछा कर उसके सोने का इंतज़ाम होना था.

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11-29-2012, 04:00 AM
Post: #3
RE: देसी मामी
भाग ३
बिस्तर पे लेटी-लेटी वो सोच रही थी. महेश कितना बदल गया है. कितना बड़ा हो गया है. कितना हंसमुख भी है. खाना खाते-खाते हंसा हंसा के मामा मामी कि हालत बिगड गयी थी! उसने देखा कि चंदर सो गए थे. वो धीरे से उठी और हॉल में चली गयी. खिडकी से बाहर सडक कि लाइट से रौशनी अंदर आ रही थी. उस रौशनी में महेश उसे साफ़ साफ़ दिख रहा था. काफी लंबा था वो. करीब ६ फीट. चंदा का कद करीब ५ फूट था और चंदर का करीब साढ़े ५ फूट. चेहरे पे एक युवक दस्तक दे रहा था. काफी हैण्डसम युवक. 'हैण्डसम' शब्द उसने किसी फिल्म में सुना था.

अचानक उसे ख्याल आया कि वो यह क्या कर रही थी? रात को चोरी चोरी अपने भांजे को निहार रही थी? जब से वो आया ठाट, वो उससे आँखे चुरा रही थी और शर्मा भी रही थी. ऐसा क्यों? एक अजीब सा दर उसके सर से पैर तक रेंग गया. वो संभली और अंदर जा कर फिर लेट गयी. इस बार थोड़ी बेचैन और अशांत थी. काफी देर तक तरह के ख्याल उसे पारेषण करते रहे. बार बार उसे महेश का मुस्कुराता चेहरा दीखता और वो सहम जाती. किसी तरह से करवट बदलते-बदलते आखिर में सो गयी.

रात में उसे अजीब अजीब सपने परेशां करते रहे. कभी चंदर उससे दूर कहीं जा रहे थे और उसका रो रो के बुरा हाल था. कभी तारा चीख चीख के रोती दिखाई दी. कभी उसे लगा कि वो एक ऊँचे पहाड़ से गिर रही है. कहते हैं सपने अंतर्मन का दर्पण होते हैं. आपके अंतर्मन में जो भी चलता रहता है, आपके सपने उसे दर्शाते हैं. चंदा के इन अजीब सपनों को समझने के लिए किसी मनोवैज्ञानिक कि ज़रूरत नहीं.

यह बात अभी उसे समझ नहीं आ रही थी, या वो समझना नहीं चाहती थी. सच यह था कि इस बार महेश को देख कर, ममता के अलावा उसके अंदर कई भावनाएं ऐसी जागी थी जो उसके संसार को हिला के रख सकती थी.

चंदा कि उम्र करीब २७ साल थी. उसकी शादी १८ साल कि होते ही माँ-बाप ने चंदर से करा दी थी. चंदा का पढाई में मन कभी नहीं लगा था. किसी तरह से वो १०वीं में पहूँची. जब दो बार फेल हो गयी तो उसके माँ-बाप समझ गए कि पढाई अब उसके बस कि बात नहीं थी. माँ ने उसे घर के काम काज में लगा दिया, जिससे कि शादी के लिए वो तैयार हो. चंदर बहुत ही अच्छा रिश्ता था. आज भी उसके मात-पिता को अपने दामाद पे गर्व था.

शादी कि पहली रात उसने काम-रस पहली बार चखा था. शादी से प[एहले ना तो कभी उसे इसका ख्याल और ना ही कोई रूचि थी. सीधी सादी लड़की थी चंदा. सहेलियों ने उसे खूब डराया था. लेकिन चंदर ने उसे बड़े प्यार से बिना जोर ज़बरदस्ती किये समझा कर, खूब देर तक छू कर, सहला कर उत्तेजित किया था. उसे थोडा दर्द हुआ था और खून देख कर वो थोडा दरी थी किन्तु चंदर उसे समझा चुके थे. उसे बहुत मज़ा भी आया था. उन दिनों चंदर निरोध का इस्तेमाल करते थे. जब उसने कोप्पर-टी लगवाई तब जाकर चंदर ने बिना निरोध के उसके साथ सम्भोग किया था. तब जा कर उसे सहवास के असली सुख का आनंद आने लग गया था. अब भी दर्द होता था किन्तु उस दर्द में अब उसे मज़ा आने लगा था.

करीब तीन साल तक उन्होंने खूब सम्भोग किया. फिर जब कोप्पर-टी निकल कर तारा उसके गर्भ में आई तो ८-९ महीने उन्होंने कोई सहवास नहीं किया. जबकि चंदा कई बार इतना तड़प उठती कि चंदर अपने हाथों से उसे सुख देने कि कोशिश करते.

जब घर में अकेली होती और अंदर से काम देवता जागते तो स्वयंसेवा कर लेती. स्वयंसेवा तो वो अब भी करती थी. अपने शरीर को वो चंदर से बेहतर जानती थी. ऐसा नहीं था कि चंदर उसे सुखी नहीं रखते थे. उनका लिंग करीब ६ इंच का परन्तु काफी मोटा था. तारा के जन्म के बाद, शादी के ९ वर्षों के बाद, आज भी जब चंदर उसके अंदर प्रवेश करते तो कुछ पलों के लिए उसे लगता कि उसकी योनी फट जायेगी. उसकी सांस रुक जाती. चंदर काफी देर तक उसपर लगे रहते. जब तक चंदर झडते, वो तीन चार बार झड चुकी होती.

अब जैसे जैसे तारा बड़ी हो रही थी और चंदर का काम बढ़ता जा रहा था, उनके सम्भोग के अवसर घटते जा रहे थे. रात में तारा को बेडरूम में बंद करके, हॉल में आवाज़ धीमी रख के वे सम्भोग करते थे. बेटी के बगल के कमरे में होने के कारण वे ठीक से मज़ा नहीं ले पाते और ऊपर से ग्लानी का भाव मन में हमेशा रहता था.

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11-29-2012, 04:00 AM
Post: #4
RE: देसी मामी
भाग ४
नहा कर जब चंदा बाथरूम से निकली तो दरवाज़ा खोलते ही महेश दिखा. दोनों टांगो के बीच हाथ भींच के खड़ा था. उसे देखते ही वो शर्माया और झट से बाथरूम में घुस गया. चंदा को अचानक ख्याल आया कि वोह केवल ब्लाउज़ और पेट्टीकोट में बाथरूम से निकल आई थी. वो भूल गयी थी पति और बेटी के अलावा अब घर में एक जवान लड़का भी था. झेम्पती हुई वोह बेडरूम चली गयी और दरवाज़ा बंद कर लिया.

अंदर जाकर लोहे के कपाट पर लगे आईने में देखने लगी कि कहीं कुछ अप्पतिजनक तो नहीं था?

अपने आपको निहारते निहारते वो खो गयी. पलट पलट के, घूम घूम कर अपने आपको देखने लगी. २७ कोई ज्यादा उम्र नहीं है. बॉलीवुड कि कई हेरोइनें उससे बूढी थी. चंदा कोई हेरोइने या मॉडल तो नहीं लगती थी लेकिन थी बहुत 'सेक्सी'. चंदर उसे अक्सर सेक्सी डार्लिंग कहते थे. चेहरा उसका लंबा था, नाक नुकीली, आँखे भूरी. कद ज्यादा नहीं था. हल्का सा पेट निकला था, परन्तु कमर अभी भी उसकी ३० ही थी. छाती काफी उभरी थी. 34c उसके ब्रा का साइज़ था. स्तन उसके काफी बड़े थे. चंदर उन्हें ख्होब दबाते और चूसते थे. जब तारा पैदा हुई थी, तो अक्सर चंदर उसका दूध पी लेते थे. लेकिन उसके शरीर में कोई देखने लायक अंग अगर था, तो वो थे उसके नितंब, कूल्हे यानि कि 'गांड'. ३६ कि गदराई गोलाइयों को चंदर खूब मसलते थे. उसकी जांघें गदराई हुई थी. यह सब देखते देखते और चंदर के साथ बिताए पलों के बारे में सोचते सोचते उसे अचानक याद आया कि उसे साड़ी पहन लेनी चाहिए.

सबेरे उठ के चंदर और तारा को तैयार करके, उनका दोपहर का खाना बांध कर उसने उन्हें विदा कर दिया था. महेश तब भी सो रहा था. किचन के अन्य काम निबटा के जब वो नहाने चली थी तब भी महेश सो रहा था. साड़ी पहन के जब वो बाहर आई तो देखा महेश नहाने गया है. उसके लिए चाय चढा कर नाश्ता निकलने लगी.

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11-29-2012, 04:00 AM
Post: #5
RE: देसी मामी
भाग ५
किचन में चाय छानते हुए उसे महेश के बाथरूम से निकलने की आवाज़ सुनाई दी. उसने हलवा एक पलते में निकाला और चाय का कप साथ ले कर बाहर निकल आई. देखा तो महेश केवल तौलिए में लिपटा पंखे के नीचे बदन सुखा रहा था.

वो थोड़ी सी झेंप गयी, फिर बोली, "बेटा, चाय नाश्ता ले लो!"

महेश पलटा और हल्का सा झेंप गया. "और तुम्हारा नाश्ता मामी?"

"ला रही हूँ. साथ में करेंगे."

अपना नाश्ता और चाय ले कर वो लौटी. साथ में बैठकर दोनों नाश्ता खाने लगे. वो इस उधेड़बुन में थी कि बात क्या करे. उसे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि गोलू जवान हो गया होगा.

"मामी, मुंबई कैसी है?" महेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

"ठीक ही है." वो बोली. उसे पता नहीं क्यूँ ऐसा लगा कि महेश उसके ब्लाउस कि गली में झाँक रहा है. पैरों के बीच एक हलकी सी तीस उठी. उसका चेहरा लाल हो गया.

"क्या हुआ मामी?" महेश के पूछने पर वो बोली, "कुछ नहीं, गर्मी कुछ ज़्यादा है, है ना?"

"है तो! मामी मैं कपडे बदल लूं अंदर जा कर?" उसने देखा कि महेश नाश्ता और चाय, दोनों खत्म कर चूका है. "अरे, पूछता क्या है. तेरा ही घर है."

महेश अंदर गया तो चंदा गहरी सोच में पड़ गयी. यह सब क्या हो रहा था. उसे ज्ञात था कि यह शायद कुछ गलत था, परन्तु उसे रोक पाने में वो खुद को बहुत लाचार महसूस कर रही थी.

महेश लौटा तो एक सफ़ेद रंग कि हाफ पैंट पहने था. तौलिए से पोछने के बावजूद शरीर पर लगे पानी को सोख कर उसके पैंट उसके लिंग से सैट कर उसके आकार और प्रकार का प्रदर्शन कर रहा था. ऊपर उसने कुछ नहीं पहना था.

चंदा उसे टकटकी लगा कर देखती रही. उसकी नज़र को अपने लंड पर देख महेश उत्तेजित हो उठा. पुछा, "क्या बात है मामी?"

"कुछ नहीं." वो बोली और सारे प्लेट गिलास इत्यादि उठा कर किचन कि ओर चल पड़ी. उसकी साँसे तेज हो चली थी.


"मामी मैं ज़रा बाहर घूम के आता हूँ"
"हाँ ठीक है"

जब उसने महेश के निकलने के बाद दरवाज़े के बंद होने कि आवाज़ सुनी तो उसके कदम न जाने क्यों बाथरूम कि ओर बढ़ चले. बाथरूम के फर्श पे उसने वीर्य पड़ा हुआ देखा. वो समझ गई कि ज़रूर महेश ने मूठ मारी थी. न जाने उसे क्या हुआ कि उसने उस वीर्य को अपनी ऊँगली से छुआ. अब भी गर्मी थी उसमे. उसका अन्र्डर्वेअर वहीँ रखा था. मदहोश सी चंदा ने महेश कि चड्ढी उठाई और उसे सूंघने लगी. सूंघते सूंघते उसकी आँखों के सामने महेश कि हाफ पैंट से उभरे हूए लंड का चित्र उसकी आँखों के सामने घूमने लगा.

उसे जैसे कोई नशा हो गया था. महेश कि चड्ढी पकडे जब वो बेडरूम में पहुंची तो उसके पैर शिथिल पड़ गए थे. उसका शरीर गर्म हो गया था और उसकी छोट गीली हो गयी थी. उसके मन में महेश का लंड उसकी चूत को चीरने के लिए तैयार था. हाफ पैंट में से वो समझ गयी थी कि महेश का लंड राक्षशी था. करीब ८- साढ़े ८ इंच लंबा और खूब मोटा.

बिस्तर में लेटते लेटते लान्खो ख्याल उसके मन से गुज़र रहे थे. "मुझे चोदो ना गोलू, मेरे बेटे" "फाड दो मेरी चूत" "पागल मत बन, यह सब क्या सोच रही है?" इत्यादि, इत्यादि. उसने उसे गोद में खिलाया था. पर आज उसके तन मन में जो आग लगी थी, उसका वो क्या करे? इसी कश्मोकश में उसने अपनी साड़ी ढीली की और पेट्टीकोट का नाडा खोल कर अपनी ऊँगली से अपनी चूत सहलाई.

उसे इतना आनंद वर्षों में नहीं मिला था. डर और अनैतिक ख्यालों से उसकी चूत कुछ ज्यादा ही गीली हो गयी थी. उसने अपनी ऊँगली कि रफ़्तार तेज कर दी. जल्दी ही वो पस्त हो गयी. जब होश में आई तो उसे एहसास हुआ कि रमेश कि चड्ढी जो वो मुंह में दबाए हुए थी, उससे पेशाब कि बदबू आ रही थी. झट से उसने अपने कपडे ठीक किये और चड्ढी वापस बाथरूम में रख आई. वो समझ नहीं पा रही थी कि इस आग का वो क्या करे.

एक तरफ उसकी चूत न जाने क्यों उसके भांजे के लंड कि प्यासी थी तो दूसरी तरफ़ उसके संस्कार उसे उलाहना दे रहे थे उसके पापी विचारों पर.

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11-29-2012, 04:00 AM
Post: #6
RE: देसी मामी
भाग ६
चंदा दोपहर का खाना बना कर, चंदर और महेश कि राह देखने लगी. चंदर ने कहा था कि आज दोपहर में खाना खाने घर आएगा और फिर महेश को साथ लेकर वी. टी. जायेगा. वहीँ पर महेश को कुछ मर्चंट नेवी के लिए रेजिस्ट्रेशन कराना था.

महेश को घूमने गए हुए काफी देर हो चुकी थी. २ बजने में कुछ मिनट ही बचे थे. तारा के स्कूल से लौटने का वक्त हो रहा था. अच्छा है! पूरा परिवार साथ में भोजन करेगा!

थोड़ी देर में जब घर कि घंटी बजी तो दरवाज़ा खोलने पर उसने देखा कि तीनों साथ में खड़े थे. तारा को महेश ने गोद में उठा रखा था. तीनों तारा के बचपने पे हंस रहे थे. घर में घुसते ही तारा महेश कि गोद से उतर कर तारा के पास दौडी आई. चंदा सबके लिए खाना परोसने लगी. बाहर चंदर और महेश उसके मर्चंट नेवी के बारे में बातें कर रहे थे.

खाना खाकर मामा और भांजा निकलने लगे. चंदर ने तारा को साथ ले लिया. ज़माने के अनुसार तारा को भी ट्यूशन जाना पड़ता था. ट्यूशन के बाद, पास में ही वह कथक सीखने जाती थी. शाम को ७ बजे तारा या चंदर उसे ले आते.

उन सबके जाने के बाद, चंदा ने सोचा कि ७ बजे के पहले कोई आने वाला तो है नहीं, न ही उसे कहीं जाना था. गर्मी भी काफी थी, उसपर से उमस ने उसका हाल बुरा कर दिया था. घर के सारे परदे लगा कर चंदा ने अपने सारे कपडे निकाल दिए और पंखा तेज कर नंगी होकर टी.वी. देखने लगी.

ऐसा वह अकेले में अक्सर करती थी. टी.वी. देखते देखते किसी सिरिअल के किरदार को देखकर उसे अचानक महेश कि याद आई. फिर सुबह कि बातें भी याद आई. कुछ देर के लिए वह सब कुछ भूल चुकी थी. लेकिन फिर उसके अंदर एक अजीब सी उथल-पुथल फिर शुरू हो गयी. तभी दरवाज़े कि घंटी बजी. अचानक तन्द्रा से बाहर आकर वह सोच ही रही थी कि क्या करे कि घंटी फिर बजी. उसने झट से बिना ब्रा और पैंटी पहने झट से पेटीकोट बंधा, ब्लाउस पहना और फटाफट सदी लपेट कर पल्लू डाल कर ब्रा और पैंटी को बाथरूम में फ़ेंक कर दरवाज़ा देखने चली गयी.

दरवाज़ा खोलने पर उसने महेश को पाया, चंदर साथ नहीं था.

"मामा अपना बटुआ भूल गए, इसलिए मुझे भेज दिया लेने."

थोड़ी चंदा कि हालत खराब थी और उसे पसीने छूट रहे थे. कपडे भी उसने जल्दबाजी में पहने थे. महेश जब घर में घुसा तो वह बेडरूम में चली गयी चंदर का बटुआ खोजने. इससे पहले कि वह अपने वस्त्र ठीक करती महेश भी उसके पीछे पीछे चला आया. अचानक उसे चंदर का बटुआ फर्श पर पड़ा हुआ दिखा. उसे उठाने के लिए वह झुकी तो उसका पल्लू गिर गया. सकपका कर वह पल्लू ठीक करते हुए उठी तो उसने देखा कि महेश सन्न सा खड़ा है और उसके चेहरे का रंग उड़ गया है. टकटकी लगाये वह उसके बूबों को निहार रहा था. उसने उसे बटुआ थमाया तो महेश को कुछ होश आया. जिज्ञासापूर्वक चंदा का ध्यान महेश कि पन्त कि ओर गया तो उसके लिंग में हुई हरकत उसे साफ़ साफ़ दिखने लगी.

महेश बटुआ लेकर जब चला गया तो दरवाज़ा अंदर से बंद करके वह आईने के सामने कड़ी हुई और पल्लू हटा कर झुक गयी. वह देखना चाहती थी कि आखिर महेश ने क्या देखा. जैसे ही वह झुकी, उसका बांया स्तन ब्लाउस से लगभग बाहर निकल आया था. उसका निप्प्ल लगभग बाहर झाँक रहा था. दायें कि गोलाई भी साफ नज़र आ रही थी.

यह देख कर उसका चेहरा लाल और गर्म हो गया. वह समझ गयी कि महेश के लिंग में फडकन तो होनी ही थी. वह समझ पा रही थी कि महेश का लिंग विशाल था. उसकी पन्त में उसके लिंग के उभर को वह दो बार देख चुकी थी. वह मन ही मन उस लिंग के रूप आकार को देखने लगी और यहाँ उसकी योनी गीली होने लगी. अब उसे साफ़ दिख रहा था कि महेश उसके स्तनों को जानवर कि तरह मसल रहा था, काट रहा था और चूस रहा था. उसका लंबा, मोटा और काला लिंग उसकी चूत को फाड रहा था. उसके नीचे पसीने से तार, वह उचक उचक कर उससे चुदवा रही थी. यह सोचते सोचते कब उसकी ऊँगली ने उसे पस्त कर दिया उसे पता ही नहीं चला. होश में आते ही वह फिर तड़प उठी. इस अंदरूनी कश्मोकश के चलते उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था.

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11-29-2012, 04:00 AM
Post: #7
RE: देसी मामी
भाग ७
शाम को करीब ६ बजे चंदर का फोन आया कि वे दोनों ट्रेन में आधे रस्ते पहुंच चुके थे और तारा को लेते हुए आयेंगे. चंदा से महेश ने खाना जल्दी तैयार करने को कहा क्यूंकि दिन कि छुट्टी के बाद रात में उन्हें काम करना होगा और फिर दो दिनों कि उन्हें छुट्टी मिलेगी.

चंदर खाना साथ ले जाना चाहते थे. चंदा ने आधी नींद में बिना आँखे खोले फोन पर बात की और अंगडाई लेकर उठी. आपने चंदा के नीरस और सामान्य जीवन के बारे में जाना है. आप जानते हैं कि चंदा महेश की ओर काफी आकर्षित है. किन्तु महेश का क्या?

भाग २ से आपको याद होगा कि महेश एक 18 साल का लड़का था. उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में उसके माता पिता रहते थे. आठवीं तक वह गांव में ही पढ़ रहा था. नौवीं से उसके माता पिता ने उसे इलाहाबाद उसके नाना नानी के यहाँ भेज दिया. शहर में कुछ अच्छे स्कूल थे जो गांव में कभी नहीं हो सकते थे. उसके माता पिता चाहते थे कि चंदर मेहनत करे और पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बने.

महेश को इलाहाबाद में किसी ने बताया कि मर्चंट नवी में भविष्य अच्छा है. मुंबई जाकर ट्रेनिंग ले लो. बारहवीं कि परीक्षा देकर मुंबई में जानकारी लेने आया था. मुंबई देखने कि लालसा भी थी. महेश पढाई में बहुत होशियार नहीं था, लेकिन पास हमेशा हो जाता था. इस कारण वो आस पास के फ़ैल होने वाले मिड्डल स्कूल के बच्चों को पढ़ा दिया करता था. जिससे उसका जेब-खर्च भी निकल जाता और काफी पैसे बच भी जाते. जब उसने अपने माता पिता को बताया कि वह मुम्बई जाना चाहता है, क्यों जाना चाहता है और यह कि उसने किस तरह तुतिओं से कुछ हज़ार रुपये बचा लियें है जिससे वह अपनी यात्रा का खर्च उठा सकता है, तो उसके माता पिता गर्व से फूल उठे. उन्हें उसे अकेले भेजते हुए डर तो लग रहा था, किन्तु महेश की ज़िम्मेदारी देखकर वह उसे जाने से रोक ना सके. चंदर मामा और मामी मुंबई में थे, वह जानता था. काफी सालों से उसकी उनसे बात चीत भी नहीं हुई थी. लेकिन उसके माता पिता भी जानते थे कि वे उनके अपने थे. निस्संकोच उन्होंने चंदर को फोन करके महेश के आने के बारे में बताया था.

चंदर और चंदा, जैसा कि आप जानते हैं, उसके आने से बहुत प्रसन्न थे. बल्कि चंदा महेश को लेकर ऐसी दुविधा में फासी थी कि अंदर ही अंदर जले जा रही थी.

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Post: #8
RE: देसी मामी
भाग ८
महेश को अपने पुरुषत्व का एहसास 18 साल कि उम्र से होने लगा था. लड़कियों के वक्ष और नितंब उसे उत्तेजित करते. बूबे और गांड, यह शब्द रात को उसे बहुत परेशान करते. उसके स्कूल कि लडकियां उसके सपनों में अक्सर नंगी होकर उसकी बाहों में आ जाती थी. मित्रों ने उसे मुठ मरने का ज्ञान दे दिया था. लड़कियों के बूबे और गांड निहारना और उनकी प्रशंसा करना उनका पसंदीदा टाइमपास था!

कई बार उसके दोस्तों ने उसे किसी लड़की पर धकेल दिया था जिससे उनके बूबे दबाने का सुखद अनुभव भी उसे मिल चूका था. लेकिन उससे ज्यादा उसे कुछ नहीं मिल पाया था. एक तो वह बहुत शर्मीला था ऊपर से लडकियां भी बहुत शरीफ थी. कोई भी बात होने पर प्रिंसिपल साहब या घर पर बात पहुँचने का डर उसे रोक कर रखता था कोई भी ऐसी वैसी हरकत करने से.

परन्तु सेक्स मैं उसकी इतनी रूचि थी कि वह कभी कभी दिन में ८-१० बार भी हिला लिया करता था.

उसने सुना था कि मुंबई में लड़कियां काफी फॉरवर्ड और चुद्दक्कड़ टाइप कि होती हैं. वहाँ लडकियां इतने कम कपडे पहनती हैं कि सपने देखने कि भी ज़रूरत नहीं. इसलिए जब मुंबई जाने का निर्णय उसने लिया तो अपने एक दोस्त से जो मुंबई में ही रहता था, उसने इस बारे में पुछा. तब वह काफी निराश हो गया. दोस्त ने उसे बताया कि यह सब कहने सुनने कि बातें हैं. सब जगह लडकियां एक जैसी ही होती हैं. यह सोच लेना कि मुंबई कि सारी लडकियां रंडियाँ है, बेवकूफी होगी!

लेकिन जैसे ही वह मुंबई पहुंचा, सचमुच तंग कपड़ों में, आधे बूबे दिखाती, गांड मटकाती एक से एक सेक्सी लड़कियों को स्टेशन से मामा के घर तक देखते हुए आया. रात को जब वह पहुंचा तो सोने से पहले उनमे से दो तीन लड़कियों को छोड़ने के ख्वाब देखते देखते मुठ मारते के बाद ही वह सोया.

सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसे बहुत जोर से पेशाब लगी थी. बाथरूम बंद था, शायद मामी उसमे नहा रही थी. वह चुप चाप उनके निकलने का बेसब्री से इन्तेज़ार करने लगा. जब मामी निकली तो वो केवल ब्लाउस और पेटीकोट में थी. उसके बूबे थोड़े थोड़े दिख रहें थे. ठीक से देख नहीं पाया क्यूंकि मूतने कि उसे जल्दी थी.

नहा के जब वह लौटा तो उसे लगा कि मामी उसके लिंग को घूर रही थी. या फिर उसके जवान मन का वेहम था. उसे बुरा भी लग रह था. ये तो उसकी माम्मी थी. मामी के बारे में ऐसे गंदे ख्याल?

नाश्ता करते करते जब वे बात कर रहें थे तो अचानक उसे एहसास हुआ कि मामी के ब्लाउस में बूबों के बीच कि गली काफी साफ़ दिख रही थी. इतने पास से उसने कभी गली को नहीं देखा था, इसलिए वो उसमे कुछ देर के लिए अटक गया. शायद मामी ने उसे पकड़ लिया था!

बाद में जब चंदर माम अपना बटुआ भूल गए थे और उसे लेने वोह घर लौटा था तब मामी बटुआ उठाने के लिए जब झुकी, तो उनके बबले ब्लाउस के बाहर लगभग निकल ही गए, उनके बाएं बूबे का गहरा गुलाबी निप्प्ल भी उसे दिख गया था. पहली बार उसने ऐसा नज़ारा देखा था. उसके दिमाग से सारा खून दौड के उसके लिंग में पहुँच गया और अचानक उसका लिंग हरकत में आ गया. महेश डर गया. कहीं मामी को समझ में आ गया कि उसके मन में उनके लिए ऐसे गंदे विचार हैं तो न जाने वो क्या करेंगी.

यह सोच के उसकी थोड़ी फट गयी थी लेकिन मन उसका मान नहीं रहा था. रस्ते भर उसे मामी का फिगर, उनके बूबे और अब उनकी गांड भी परेशां कर रहें थे.

मामा ने जब देखा कि महेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं तो पूछ ही लिया,"क्या बात है बेटा, कुछ परेशानी है क्या?"

महेश डर गया कि कहीं मामा समझ तो नहीं गए कि उसके मन में क्या पाप पनप रहा है. चंदर मामा ने ही उसे इस दुविधा से बचा लिया,
"लगता है गर्मी ने तुम्हारी हालत खराब कर दी है. स्टशन पहुँच के एक ठंडा पी लेना, ठीक?"

महेश ने हाँ में सर हिलाते हुए चैन कि सांस ली. लेकिन दिन भर बार बार चंदा मामी को लेकर अजीब अजीब ख़याल उसके मन में आते रहें. शाम तक सारे काम करते करते, उसका मन इन बातों से थोडा भटका तो वह फिर सामान्य हो गया.

शाम को तारा को स्कूल से लेने के बाद उसे गोद में खिलते खिलते मामा के साथ घर लौटते लौटे, वह सुबह कि घटनाओं को भूल गया.

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11-29-2012, 04:00 AM
Post: #9
RE: देसी मामी
भाग ९
चंदा खाना तैयार कर सबका इन्तेज़ार करने लगी. करीब ८ बजे तीनों घर पहुंचे. तारा और महेश को पास के एक गार्डन में चंदर घुमाने ले गए थे. सबने खाना खाया और फिर चंदर अंदर कुछ देर आराम करने चले गए. करीब १० बजे वे निकलने वाले थे.

फिर तारा और महेश साथ में टीवी देखने लगे. चंदा भी देख रही थी. चोर निगाहों से वो बार बार महेश को देख रही थी. लेकिन महेश तारा के साथ खेलने में व्यस्त था.

तैयार होकर चंदर साईट के लिए चल पड़े. उन्हें अलविदा कर वोह तारा को लेकर अंदर चली गयी. महेश बाहर टीवी देखता रहा. थोदी देर बाद तारा सो गयी. चंदा दिन में सो चुकी थी. उसे अभी नींद नहीं आ रही थी. उसने सोचा बाहर जा कर टीवी देख ले. साथ ही महेश से कुछ देर गप शप हो जायेगी.

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11-29-2012, 04:01 AM
Post: #10
RE: देसी मामी
भाग १०
बाहर गयी तो देखा महेश वहीँ गद्दे पर सो गया था और पसीने से भीगा पड़ा था. टीवी अब भी चल रहा था. वह समझ गयी कि दिनभर कि थकान के कारण वह टीवी देखते दखते सो गया. अचानक उसे ध्यान आया कि पंखा तो बंद था. महेश पसीने में लथपथ था.

जाकर जब वह पंखा चालू करने गयी तो देखा कि स्विच तो चालू था. उसने स्विच को कई बार चालु बंद किया और रेगुलेटर को भी खूब घुमाया लेकिन पंखा चलने का नाम नहीं ले रहा था. गर्मी भी बहुत थी. महेश पर उसे दया आने लगी. पहले उसने टीवी बंद किया.

टीवी बंद होते ही अचानक एकदम शांति हो गयी और महेश जग गया. उठ कर उसने देखा कि मामी ने टीवी बंद कर दिया है. फिर उसका ध्यान अपने हाल पर आया. हाथ से उसने अपना चेहरा पोछा और पंखे कि ओर देखा. फिर चंदा कि ओर देखा.

"पंखा शायद खराब हो गया है गोलू.", चंदा बोली. महेश थोडा खीज गया. इतनी गर्मी में बिन पंखे के दुबारा सो पाना मुश्किल था. तभी चंदा बोली,"अंदर चले चलो, पंखा चल रहा है. तारा भी सो गयी है. तुम भी आ जाओ. यहाँ तो सो नहीं पाओगे." बोलते बोलते ही चंदा के मन में अनेक संभावनाओं के ख्याल उठे. कान के पास एक हलकी सी सिहरन महसूस हुई.

महेश सचमुच थका हुआ था और उसे काफी नींद आ रही थी. वह कुछ नहीं बोला और उठ कर सर खुजाते हुए अंदर जागर बिस्तर कि बायीं ओर पेट के बल लेट गया. तारा बिस्तर के बीच में सो रही थी.

चंदा ने हॉल कि लाइट बुझा दी और खुद भी बेडरूम में चल पड़ी. अभी भी वह साड़ी पहने हुए थी. ज़्यादातर गर्मी में वह केवल एक मैक्सी (बड़ी ढीली ढाली और लंबी नाइटी) पहना करती थी. अंदर कुछ नहीं. अभी तक कपडे बदलने का मौका उसे नहीं मिला था. उसके मन में थोडा संकोच भी था. मन का पाप भी उसे परेशान कर रहा था. उसे लगा कि अगर उसने मैक्सी पहन ली तो रात में कही कुछ अनैतिक न हो जाए. इसलिए साड़ी पहने हुए ही सोना उसने उचित समझा.

जाकर तारा कि बगल में लेट गयी.

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