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प्रेतनी का मायाजाल
09-26-2012, 05:53 PM
Post: #1
प्रेतनी का मायाजाल
शाम के सात बजकर चवालीस मिनट हो चुके थे । वातावरण में हल्का हल्का अंधेरा फ़ैल चुका था । मैं इस समय कलियारी कुटी नामक एक गुप्त स्थान पर मौजूद था । कलियारी कुटी के आसपास का लगभग सौ किलोमीटर इलाका निर्जन वन था । सिर्फ़ उसकी एक साइड को छोडकर । जो यहां से तीन किलोमीटर दूर कलियारी विलेज के नाम से जाना जाता था । इस को इस तरह से समझें । कि सौ किलोमीटर व्यास का एक वृत बनायें और उसमें बीस डिग्री का हिस्सा काट दिया जाय । यही बीस डिग्री का हिस्सा इंसानों के सम्पर्क वाला था । शेष हिस्सा एकदम निर्जन रहता था । कलियारी कुटी को साधना स्थली के रूप मेंमुझे मेरे गुरु " बाबाजी " ने प्रदान किया था । और तबसे इस स्थान पर मैं कई बार सशरीर और अशरीर आ चुका था । अपनी पहली अंतरिक्ष यात्रा मैंने इसी स्थान से अशरीर की थी । कलियारी कुटी के छह किलोमीटर के दायरे में किसी तपस्वी पुरुष की " आन " लगी हुयी थी । वो तपस्वी पुरुष कौन था । इसकी जानकारी मुझे नहीं थी । और न ही बाबाजी ने मुझे कभी बताया था । मेरी कुटी के निकट ही पहाडी श्रंखला से एक झरना निकलता था । जिसमें पत्थरों के टकराने से साफ़ हुआ पानी उजले कांच के समान चमकता था । ये इतना स्वच्छ और बेहतरीन जल था कि कोई भी इसको आराम से पी सकता था । कुटी से चार फ़र्लांग दूर वो पहाडी थी जिस पर इस वक्त मैं मौजूद था । इस पहाडी पर चार फ़ुट चौडी और दस फ़ुट लम्बी दो फ़ुट मोटी दो पत्थर की शिलाएं एक घने वृक्ष के नीचे बिछी हुयी थी । इस तरह यह एक शानदार प्राकृतिक डबल बेड था । कलियारी विलेज से साडे तीन किलोमीटर की दूरी पर और इस पहाडी से आधा किलोमीटर की दूरी पर एक पुराना शमशान स्थल था । इसके एक साइड का दो किलोमीटर का इलाका किसी नीच शक्ति ने " बांध " रखा था । कभी कभी मुझे हैरत होती थी कि एक ही स्थान पर दो विपरीत शक्तिंयां यानी सात्विक और तामसिक अगल बगल ही मौजूद थी जो एक तरह से असंभव जैसा था । मैंने एक सिगरेट सुलगायी और कलियारी विलेज की और देखने लगा । जहां बहुत हल्के प्रकाश के रूप में जीवन चिह्न नजर आ रहे थे । एक तरफ़ साधना के लिये इंसानी जीवन से दूर निर्जन में भागना और दूसरी तरफ़ लगभग अपरिचित से इस जनजीवन को दूर से देखना एक अजीव सी सुखद अनुभूति देता था ।
मैं पहाडी पर टहलते हुये अपने घर के बारे में सोचने लगा । नीलेश अपनी गर्लफ़्रेंड मानसी के साथ उसके घर मारीशस गया हुआ था । बाबाजी किसी अग्यात स्थान पर थे और इस वक्त मेरे सम्पर्क में नहीं थे । मैंने अंतरिक्ष की और देखा । जहां धीरे धीरे जवान होती रात के साथ असंख्य तारे नजर आने लगे थे । ऐसा दिल कर रहा था । कलियारी कुटी में अशरीर होकर सूक्ष्म लोकों की यात्रा पर निकल जाऊं । जो इन्ही तारों के बीच अंतरिक्ष में हर ओर फ़ैले हुये थे । परबाबाजी के आदेशानुसार मुझे बीस दिन का समय इसी कलियारी कुटी में एक विशेष साधना करते हुये बिताना था ।
" दाता । " मेरे मुख से आह निकली, " तेरी लीला अजीव है । अपरम्पार है । "
मैंने रिस्टवाच की लाइट आन कर समय देखा । रात के नौ बजने वाले थे । कि तभी मुझे आसपास एक विचित्र अहसास होने लगा ।
हत्या..कुसुम..हत्या. .कुसुम..ये शब्द बार बार मेरे जेहन पर दस्तक देने लगे । इसका सीधा सा मतलब था । कि आसपास कोई सामान्य आदमी मौजूद है । जिसके दिमाग में इस तरह के विचारों का अंधड चल रहा था । इस आन लगे हुये और दूसरी साइड पर बांधे गये स्थान पर एक सामान्य आदमी का मौजूद होना । और वो भी किसी हत्या के इरादे से । एक अजूबे से कम नहीं था । तपस्वी की " आन " लगा हुआ स्थान इंटरनेट के उस " वाइ फ़ाइ " स्थान के समान होता है । जिसमें आम जिंदगी की बात दूर से ही बिना प्रयास के कैच होने लगती है । और इसी आन के प्रभाव से " जीव " श्रेणी में आने वाली आत्मायें एक अग्यात प्रभाव से उस स्थान से अनजाने ही दूर रहती हैं । मैं इस नयी हलचल के बारे में सोच ही रहा था कि शमशान स्थल की तरफ़ एक रोशनी हुयी । और कुछ ही देर में बुझ गयी । क्या माजरा था ? मैं पूर्ण सचेतन होकर उसी तरफ़ । उस अनजान जीव की तरफ़
एकाग्र हो गया । क्या मैं उसके पास जाकर देखूं । मैंने सोचा । या यहीं से उसका " माइंड रीड " करूं । अपना यही विचार मुझे सही लगा । और मैंने उसके दिमाग से " कनेक्टिविटी " जोड दी । वह एक आदमी था । जिसके पास इस समय एक भरी हुयी रिवाल्वर थी । और वह कुसुम नाम की किसी औरत की हत्या कर देना चाहता था । इससे ज्यादा इस वक्त उसके दिमाग में और कुछ नहीं था । जो मैं रीड करता । उसकी जिन्दगी के और पिछ्ले पन्ने मैंने खोलने की कोशिश की । जिसमें मैं उस वक्त पूर्णतया असफ़ल रहा । इसकी बेहद ठोस वजह ये थी । कि इस वक्त वह आदमी पूरी एकाग्रता से इसी विचार पर केन्द्रित था । और उसकी जिन्दगी के अन्य अध्याय बैंक के किसी मजबूत सेफ़ वाल्ट की तरह लाक्ड थे । कुसुम नाम की औरत कौन थी और इस वक्त यहां क्योंकर आयेगी । ये मेरे लिये एक अजीव गुत्थी थी । अब मेरे लिये एक बडा सवाल ये था कि मैं उससे कैसे बात करूं ? करूं या न करूं । मैं उससे कैसे पूछूंगा कि वो यहां क्यों है ? यही सवाल वो मुझसे करेगा तो मैं क्या जबाब दूंगा ?


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09-26-2012, 05:53 PM
Post: #2
RE: प्रेतनी का मायाजाल
मालको । " मैंने आह भरी । " अजव में अजव खेल है तेरे । "
फ़िर मुझे एक उपाय सूझा । पहल उसी की तरफ़ से हो तो अच्छा था । मैंने कमर में बंधी बेल्ट से लटकती टार्च निकाली और जलाकर तीन चार बार सर्चलाइट की तरह इस तरह घुमाया । मानों सरकस वाले शो प्रारम्भ होने पर घुमा रहे हों । परिणाम मेरी आशा के अनुरूप ही निकला । वह मेरी यानी किसी की उपस्थित जान गया था । और इसकी एक ही वजह थी । उस समय उसका बेहद चौंकन्ना होना । वह इस नयी स्थिति पर कुछ देर तक खडा खडा सोचता रहा और फ़िर मानो एक निर्णय के साथ मेरी ओर आने लगा । मैंने उसे अपनी और भी सही पोजीशन जताने के लिये आठ दस बार लाइटर इस तरह जलाया बुझाया । मानों सिगरेट जलाने में किसी तरह की दिक्कत हो रही हो । दस मिनट बाद ही वह पहाडी से नीचे एक वृक्ष के पास आकर खडा हो गया । पर उसने मेरे पास आने या मुझे पुकारने की कोई कोशिश नहीं की । उल्टे उसने मेरा फ़ार्मूला मुझी पर आजमाते हुये सिगरेट बीडी में से कुछ मुंह से लगाकर तीन बार माचिस को जलाया । अब वह मुझसे लगभग दो सौ कदम दूर पहाडी के नीचे कुछ हटकर मौजूद था । हम दोनों ही कशमकश में थे । कि एक दूसरे के बारे में कैसे जाना जाय ? तब उसने मानों निरुद्देश्य ही टार्च की रोशनी अपने ऊपर पेड पर फ़ेंकी और स्वाभाविक ही मेरे मुख से तेज आवाज में निकला ।
" ए वहां पर कौन है ? "
" मैं हूं । " वह तेज आवाज में चिल्लाया । " दयाराम । "
अगले कुछ ही मिनटों में वह मेरे पास पत्थर की शिला पर बैठा था और मुझे उस निर्जन और वीराने स्थान में अकेला देखकर बेहद हैरान था । उसकी ये हैरानी और तीव्र जिग्यासा मेरा अत्यधिक नुकसान कर सकती थी । इसलिये मैंने उसे बताया कि मैं बायोलोजी का स्टूडेंट हूं । और मेरा कार्य कुछ अलग किस्म के जीव जन्तुओं पर शोध करना है । जो प्रायः इस क्षेत्र में मिलते है । मैंने जानबूझकर आधी अंग्रेजी और बेहद कठिन शब्दों का प्रयोग किया था । ताकि मेरी बात भले ही उसकी समझ में न आये । पर वह मेरे यहां होने के बारे में अधिक संदेह न करे । और कुछ समझता हुआ । कुछ न समझता हुआ संतुष्ट जाय । वही हुआ । लेकिन इसमें मेरी चपल बातों से ज्यादा इस वक्त उसकी मानसिक स्थिति सहयोग कर रही थी । जिसके लिये वह इस लगभग भुतहा और डरावने स्थान पर रात के इस समय मौजूद था ।
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09-26-2012, 05:53 PM
Post: #3
RE: प्रेतनी का मायाजाल
कुछ देर में संयत हो जाने के बाद उसने मेरा नाम पूछा । मैंने सहज भाव से बताया ।
" प्रसून जी । " वह आसमान की तरफ़ देखता हुआ बोला । " आपकी शादी हो चुकी है ? "
" नहीं । " मैंने जंगली क्षेत्र में लगे घने पेडों की तरफ़ देखते हुये कहा । " दरअसल कोई लडकी मुझे पसन्द नहीं करती । आप की निगाह में कोई सीधी साधी लडकी हो तो बताना । "
" तुम खुशकिस्मत हो दोस्त । " उसने एक गहरी सांस ली । " इस सृष्टि में औरत से ज्यादा खतरनाक कोई चीज नहीं है ? "
वह कुछ देर तक सोच में डूबा रहा । फ़िर उसने चरस से भरी हुयी सिगरेट निकालकर सुलगायी और एक दूसरी सिगरेट मुझे आफ़र की । लेकिन मेरे मना करने के बाद वह सिगरेट के कश लगाता हुआ मानों अतीत में कहीं खो गया । और मेरी उपस्थिति को भी भूल गया । मैंने एक सादा सिगरेट सुलगायी और रिस्टवाच पर नजर डाली । रात के दस बजने वाले थे । चरस की सिगरेट की अजीव और कसैली महक वातावरण में तेजी से फ़ैल रही थी । दयाराम हल्के नशे में मालूम होता था । इसका सीधा सा अर्थ था कि मेरे पास आने से पूर्व ही वह एक दो सिगरेट और भी पी चुका था । यह मेरे लिये बिना प्रयास फ़ायदे का सौदा था । सच्चाई जानने के लिये मुझे उसके दिमाग से ज्यादा छेडछाड नहीं करनी थी । बल्कि उस गम के मारे ने खुद ही रो रोकर मुझे अफ़साना ए जिन्दगी सुनाना था ।
कोई बीस मिनट तक वह चरसी सिगरेट के सुट्टे लगाता रहा । फ़िर उसने शमशान की तरफ़ निगाह डाली । मानों वह बडी बेकरारी से किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो । मुझे उसकी इस हरकत पर हैरत हो रही थी । अंधेरे में भला वह कैसे अपने लक्ष्य को देख सकता था । हांलाकि चन्द्रमा की रोशनी से गहरा अंधेरा तो नहीं था । फ़िर भी वह इतना पर्याप्त नही था कि यहां से आधा किलोमीटर दूर स्थित वह किसी को देख सके । उसने दो तीन बार माचिस जलाकर बहाने से मेरा चेहरा मोहरा देखकर ये अन्दाजा लगाने की कोशिश की । कि मैं विश्वास करने योग्य हूं या नही ।
मैं अच्छी तरह समझ रहा था कि वो बार बार यही सोच रहा है कि अपना राज मुझे बताये या ना बताये । " तुम । " वह बोला । " सोच रहे होगे । कि आखिर मैं कौन हूं । यहां क्यों आया हूं । सच तो ये है प्रसून । मैं अपनी बीबी की हत्या करने आया हूं । वो बीबी जो मेरी बीबी है । पर जो मेरी बीबी नहीं है । " बात के बीच में ही वो अचानक हंसा । फ़िर जोर से हंसा । और अट्टहास करने लगा । " उफ़ है न कमाल ।
बीबी है । पर बीबी नहीं है । तो सबाल ये है प्रसून कि बीबी आखिर कहां गयी ? है वही । पर वो नही है । तो फ़िर कुसुम कहां गयी । अगर मेरे साथ चार साल से रह रही औरत एक प्रेतनी है । तो फ़िर कुसुम कहां है ? तो क्या कुसुम लडकी नहीं एक प्रेत है ? कौन यकीन करेगा इस पर ? " " तुम । तुम । " वह मुझे लक्ष्य करता हुआ बोला । " तुम शायद यकीन कर लो । और तुम यकीन करो या ना करो । पर इस वीराने में तुम्हें अपनी दास्तान बताकर मेरे सीने का ये बोझ हल्का हो जायेगा...? "
दयाराम परतापुर का रहने वाला था । उसकी तीन शादिंया हो चुकी थी । पर शायद उसकी किस्मत में पत्नी का सुख नहीं था
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09-26-2012, 05:53 PM
Post: #4
RE: प्रेतनी का मायाजाल
दयाराम की पहली शादी पच्चीस बरस की आयु में राजदेवी के साथ हुयी थी । नौ साल तक उसका साथ निभाने के बाद राजदेवी का देहान्त हो गया । मरने से पूर्व सात साल तक राजदेवी गम्भीर रूप से बीमार ही रही थी और इसी बीमारी के चलते अंततः उसका देहान्त हो गया । राजदेवी के कोई संतान नहीं हुयी थी । पैंतीस बरस की आयु में दयाराम का दूसरा विवाह शारदा के साथ हुआ । शारदा से दयाराम को तीन बच्चों का बाप बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उनकी ग्रहस्थी मजे से चल रही थी कि एक दिन चौदह साल बाद शारदा भी बिजली के करेंट से चिपक कर मर गयी ।
जिस दिन शारदा मरी । उसका सबसे छोटा बच्चा दो साल का था । बीच का आठ साल का । और बडा ग्यारह साल का । दयाराम के सामने बच्चों के पालन पोषण की बेहद समस्या आ गयी । उसके घर में ऐसा कोई नहीं था । जो इस जिम्मेदारी को संभाल लेता । तब दयाराम की सास ने अपने धेवतों का मुख देखते हुये अपनी तीस साल की लडकी कुसुम जो शादी के सात साल बाद विधवा हो गयी थी । उसकी शादी फ़िर से दयाराम के साथ कर दी । यहीं से दयाराम की जिंदगी में अजीव भूचाल आना शुरू हो गया ?
विवाह के बाद दयाराम कुसुम को पहली बार जब बुलाने गया । तो मोटर साइकिल से गया था ।। उसके घर और ससुराल के बीच में लगभग एक सौ साठ किलोमीटर का फ़ासला था । लगभग सौ किलोमीटर का फ़ासला तय करते करते दोपहर हो गयी । दयाराम ने सुस्ताने और खाना खाने के विचार से मोटर साइकिल एक बगिया में रोक दी । घने वृक्षों से युक्त इस बगिया में एक कूंआ था । जिस पर एक रस्सी बाल्टी राहगीरों को पानी उपलब्ध कराने के लिये हर समय रखी रहती थी । बगिया से कुछ ही दूर पर बडे बडे तीन गड्डे थे । और कुछ ही आगे एक विशाल पीपल के पेड के पास एक बडी पोखर थी । थकान सा अनुभव करते हुये दयाराम का ध्यान इस विचित्र और रहस्यमय बगिया के रहस्यमय वातावरण की ओर नहीं गया । अलबत्ता खेतों हारों बाग बगीचों में ही अधिक घूमने वाली कुसुम को जाने क्यों ये बगिया बडी रहस्यमय सी लग रही थी । बगिया एक अजीब सा रहस्यमय सन्नाटा ओडे हुये जान पडती थी । उसके पेडों पर बैठे उल्लू और खुसटिया जैसे पक्षी मानों एकटक कुसुम को ही देख रहे थे । दयाराम खाना खाकर आराम करने के लिये लेट गया था ।
लेकिन कुसुम कई सालों बाद एक आदमी की निकटता पाकर शीघ्र सम्भोग के लिये उत्सुक हो रही थी । जब दयाराम ने बगिया में मोटर साइकिल रोकी थी । तभी उसने सोचा था । कि दयाराम ने ये निर्जन स्थान इसीलिये चुना है कि वो भी कुसुम के साथ सहवास की इच्छा रखता है । क्योंकि बगिया के आसपास दूर तक गांव नहीं थे । और न ही वहां कोई पशु चराने वाले थे । अपने पति के मरने के बाद कुसुम सम्भोग सुख से वंचित रही थी । इसलिये आज दयाराम को दूसरे पति के रूप में पाकर उसकी सम्भोग की वह इच्छा स्वाभाविक ही बलबती हो उठी ।
पर उसकी इच्छा के विपरीत दयाराम लेटते ही सो गया और जल्दी ही खर्राटे लेने लगा । हालांकि कुसुम भी कुछ थकान महसूस कर रही थी । पर कामवासना के कीडे उसके अन्दर कुलुबुला रहे थे । जिनके चलते वह बैचेनी महसूस कर रही थी । अभी वह दयाराम से इतनी खुली नहीं थी कि उसे जगाकर सम्भोग का प्रस्ताव कर देती । उसने एक आह भरी और सूनी बगिया के चारों तरफ़ देखा ।
फ़िर हारकर वह एक पेड से टिककर बैठ गयी । और उसकी निगाह वृक्षों पर घूमने लगी । तब अचानक ही उसके शरीर में जोर की झुरझुरी हुयी और उसके समस्त शरीर के रोंगटे खडे हो गये । उल्लू जैसे वो छोटे छोटे पक्षी कुसुम को ही एकटक देख रहे थे । उनकी मुखाकृति ऐसी थी । मानों हंस रहे हों । उसने अन्य वृक्षों पर नजर डाली । वहां भी उसे एक भी सामान्य पक्षी नजर नहीं आया । सभी गोल मुंह वाले थे और एकटक उसी को देख रहे थे । पहली बार कुसुम को अहसास हुआ कि क्यों वो बगिया उसे रहस्यमय लग रही थी । वहां अदृश्य में भी किसी के होने का अहसास था । कोई था जो उसके आसपास था । बेहद पास । भयभीत होकर उसने दयाराम को पुकारा । पर वह जैसे मायावी नींद में सो रहा था । तभी कुसुम ने अपने स्तनों पर किसी का स्पर्श महसूस किया । वह बेहद घबरा गयी । अभी वह कुछ समझ पाती कि उसकी योनि को किसी ने छुआ । वह चिल्लायी । बचाओ । पर उसके मुंह से आवाज न निकली । तब उसका सिर चकराने लगा । और कोई उसे जोहड की तरफ़ खेंचकर ले जाने लगा । कुसुम की चेतना गहन अंधकार की गहराईयों में डूबती चली गयी ।
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09-26-2012, 05:54 PM
Post: #5
RE: प्रेतनी का मायाजाल
" फ़ंगत । " मेरे मुंह से अचानक निकल गया । " लोखटा ? "
दयाराम ने चौंककर मेरी तरफ़ देखा । वह अतीत से बाहर आ गया था । उसका नशा हल्का होने लगा था । मैंने एक सिगरेट जलायी और सिगरेट केस उसकी तरफ़ बडाया । सिगरेट सुलगाने के बाद उसने फ़िर एक निगाह शमशान पर डाली । पर वहां कोई नहीं था । पेंट में घुसी हुयी रिवाल्वर से उसे परेशानी हो रही थी । उसने रिवाल्वर निकालकर शिला पर रख दी । और सिगरेट के कश लगाता हुआ टहलने लगा । फ़िर मानों उसे कुछ याद आया । और वह बोला, " अभी अभी तुमने क्या कहा था । लोखटा ? "
यह एक तरह से मुझसे गलती हो गयी थी । मैं दयाराम को अपनी प्रेत जगत आदि की जानकारी का परिचय नहीं देना चाहता था । क्योंकि ऐसा होने पर वह उत्सुकता से अनेकों सवाल करता और सबसे बडी बात कलियारी कुटी वाला गुप्त स्थान जो इस पहाडी से महज चार फ़र्लांग दूर था । उस तरफ़ उसका ध्यान जा सकता था । और उस स्थिति में मुझे विशेष उपाय करने होते । अतः मैंने बात को घुमाते हुये कहा, " कुछ नहीं अभी अभी मुझे एक दुर्लभ जीव पास ही नजर आया था । पर मेरा ध्यान तुम्हारी बातों पर लगा था । खैर कोई बात नहीं जाने दो । फ़िर आयेगा । "
(** फ़ंगत या लोखटा प्रेत की वो किस्म होती है । जो किसी अभिशप्त स्थान पर या इस्तेमाल न किये जाने वाले शमशान स्थल के आसपास ही रहती है । )
अब तक दयाराम की संगत में मैं बहुत कुछ जान गया था । कुछ घटना वह अपने दिमाग से अपनी जानकारी के अनुसार सुना अवश्य रहा था । पर कुछ रहस्य इसमें ऐसा भी था । जिसके बारे में दयाराम नहीं जानता था । दरअसल ना जानकारी में दयाराम एक अभिशप्त बगिया और अभिशप्त स्थान पर रुक गया था । जहां प्रेतवासा था । और पचास साठ या अस्सी साल पहले उस स्थान को शमशान के रूप में प्रयोग किया जाता होगा । बाद में कुछ घटनाएं ऐसी घटी होंगी । जिससे वो स्थान अभिशप्त या अछूत समझा जाने लगा होगा । इसी वजह से उसके आसपास आवादी नहीं थी । और इसी वजह से वहां पशु आदि चराने वाले नहीं थे । क्योंकि जो लोग प्रेतवासा के बारे में जानते होंगे । वह जानबूझकर आफ़त क्यों मोल लेंगे । इस तरह धीरे धीरे मनुष्य के दूर होते चले जाने से उस स्थान पर प्रेतों का कब्जा पक्का होता चला गया ।
Quote:और दयाराम कुसुम जैसे व्यक्ति अग्यानता में उसमें फ़ंसने लगे ।
पर मेरे दिमाग में और भी बहुत से सवाल थे । कुसुम पर प्रेत का आवेश हो जाना कोई बडी बात नहीं थी ।
लेकिन चार साल में उसने या प्रेत ने ऐसा क्या किया था जो दयाराम उसे मारने पर आमादा था ?
दयाराम को कैसे मालूम पडा कि कुसुम पर प्रेत था ?

उसने क्या इलाज कराया ?
और सबसे बडा सबाल दयाराम उसको मारना ही चाहता था तो घर पर आसानी से मार सकता था ।
वह इस वीराने में क्यों आया ?
चार साल तक प्रेतनी का एक आदमी के साथ रहना मामूली बात नहीं थी । आखिर प्रेतनी कौन थी और क्या चाहती थी ?
अगर प्रेतनी पूरी तरह कुसुम के शरीर का इस्तेमाल कर रही थी तो कुसुम इस वक्त कहां थी और किस हालत में थी ?
ये ऐसे कई सवाल थे । जिनका उत्तर दयाराम और सही उत्तर कुसुम के पास था ।
पर कुसुम इस वक्त कहां थी ?.....................................
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09-26-2012, 05:54 PM
Post: #6
RE: प्रेतनी का मायाजाल
बेहद सुहानी मगर बेहद रहस्यमय हो उठी रात धीरे धीरे अपना सफ़र तय कर रही थी । मैंने कलियारी कुटी की तरफ़ देखा । अगर दयाराम न आया होता तो मैं क्या कर रहा होता ? दयाराम अब भी टहल रहा था । उसने उत्सुकतावश शिला पर रखी टार्च की रोशनी पेड पर डाली । पेड नीबू और बेर के मिले जुले आकार वाले फ़लों से लदा पडा था । ये गूदेदार मीठा फ़ल था । जो अक्सर मैं भूख लगने पर खा लिया करता था । कलियारी कुटी से पांच सौ मीटर दूर ऐसा ही एक अन्य वृक्ष था । जिस पर जामुन के समान लाल और बेंगनी चित्तेदार फ़ल लगते थे ।
ये फ़ल भी खाने में स्वादिष्ट थे । पर ये एक चमत्कार की तरह कलियारी विलेज और अन्य गांव वालों से बचे हुये थे । क्योंकि पहाडी के नीचे का इलाका किसी प्रेत शक्ति ने बांध रखा था । और कलियारी कुटी को किसी तपस्वी की आन लगी हुयी थी । ऐसी हालत में सामान्य मनुष्य यदि इधर आने की कोशिश करता तो उसे डरावने मायावी अनुभव हो सकते थे ।
जैसे अचानक बडे अजगर का दिखाई दे जाना । अचानक किसी हिंसक जन्तु का प्रकट हो जाना । अचानक कोई रहस्यमयी आकृति का दिखाई देना । वर्जित क्षेत्र में कदम रखने वाले को तेज चक्कर आने लगना । आदि जैसे कई प्रभाव हो सकते थे । जिससे आदमी घबरा जाता है और ऐसी जगहों पर आना छोड देता है । ये वास्तविकता दयाराम भी नहीं जानता था कि वो मेरे होने से इतनी देर यहां टिक सका था । वरना शिकारी खुद ही शिकार हो जाना था । प्रेतों के लिये रिवाल्वर का भला क्या महत्व था ? अचानक दयाराम चौकन्ना हो उठा । मैं रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया । दयाराम ने फ़ुर्ती से रिवाल्वर उठा ली और सतर्कता से इधर उधर देखने लगा । मैं जानता था कि उसके रोंगटे खडे हो चुके हैं । और निकट ही वह किसी की प्रेत की उपस्थिति महसूस कर रहा है । जिसका कि चार साल के अनुभव में वह अभ्यस्त हो चुका था
Quote:वास्तव में उस वक्त वहां दो प्रेत पहाडी के नीचे मौजूद थे । जो मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे । उनमें से एक औरत अंगी था । जो शायद कुसुम थी । और दूसरा पुरुष अंगी था । हालांकि मैं " कवर्ड " स्थिति में था फ़िर भी वे ऊपर नहीं आ रहे थे । इसके दो कारण थे । एक तो ऊपर वाला इलाका लगभग आन के क्षेत्र में आता था । जहां प्रेत क्या यक्ष किन्नर गंधर्ब डाकिनी शाकिनी जैसी शक्तियां भी घुसने से पहले सौ बार सोचती । दूसरे मैं भले ही कवर्ड
( उच्च स्तर के तान्त्रिक साधक अपने को एक ऐसे अदृष्य कवच में बन्द कर लेते हैं जिससे उनकी असलियत का पता नहीं चलता । उच्च स्तर के महात्मा साधु संत प्रायः इस तरीके को अपनाते हैं जो किन्ही अग्यात कारणोंवश बेहद आवश्यक होता है । ) था । पर उस स्थिति में भी वे एक अनजाना भय महसूस कर रहे थे । उन्हें खतरे की बू आ रही थी । मैं दयाराम को और अधिक डिस्टर्ब नहीं होने देना चाहता था ।
इस तरह मेरा कीमती समय नष्ट हो सकता था । मैंने उसकी निगाह बचाते हुये एक ढेला उठाया । और फ़ूंक मारकर प्रेतों की और उछाल दिया । मुझे इसकी प्रतिक्रिया पहले ही पता थी । प्रेत अपने अंगो में जबरदस्त खुजली महसूस करते हुये तेजी से वहां से भागे । उनका अनुमान सही था । पहाडी पर उनके लिये खतरा मौजूद था । और वे अब लौटकर आने वाले नहीं थे । कुछ ही देर में दयाराम सामान्य स्थिति में आ गया । वह फ़िर से पत्थर की शिला पर बैठ गया । और बैचेनी से अपनी उंगलिया चटका रहा था । एक खुशहाली की खातिर । अपने बच्चों की सही परवरिश की खातिर उसने तीसरी बार शादी की थी और उस शादी ने उसके पूरे जीवन में आग लगा दी थी । पर वह कुछ भी तो नहीं कर सका । क्या करता बेचारा ?
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09-26-2012, 05:54 PM
Post: #7
RE: प्रेतनी का मायाजाल
फ़िर । " उसका ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करते हुये मैंने पूछा, " उसके बाद क्या हुआ ? "
बगिया में सोया हुआ दयाराम अचानक हडबडाकर उठा । उसने कलाई घडी पर नजर डाली तो तीन बजने वाले थे । यानी ढाई घन्टे वह एक तरह से घोडे बेचकर सोया था । उसे हैरत थी । ऐसी चमत्कारी नींद अचानक उसे कैसे आ गयी थी ? वह तो महज आधा घन्टा आराम करने के उद्देश्य से लेट गया था । मगर लेटते ही उसकी चेतना ऐसे लुप्त हुयी । मानों किसी नशे के कारण बेहोशी आयी हो । पर वह नींद में भी नहीं था ? अपनी उसी अचेतन अवस्था में वह एक घनघोर भयानक जंगल में भागा चला जा रहा था । जंगल में रहस्यमयी पीला काला अंधकार छाया हुआ था । आसमान और उजाला कहीं नजर नहीं आ रहा था । चारों तरफ़ वृक्ष ही वृक्ष थे । उन वृक्षों के बीच में छोटे छोटे मंदिर बने हुये थे । दयाराम को ऐसा लग रहा था कि कुछ अग्यात लोग उसके पीछे पडे हुये हैं । जो उसको मार डालना चाहते हैं । बस उन्हीं से बचने को वह भाग रहा था । अचानक भागते में ही वह एक पेड की झुकी डाली से टकराया और गिर पडा । बस इसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा । दयाराम ने एक बैचेन दृष्टि कुसुम की तलाश में इधर उधर दौडाई । वह गुमसुम सी एक पेड के नीचे बैठी थी । मानों औरत के स्थान पर एक जिंदा लाश हो ? वह अपलक आंखो से कुंए की ओर देख रही थी । दयाराम ने उसे पुकारा और आगे की यात्रा के लिये तैयार हो गया । वह मशीनी अन्दाज में मोटर साइकिल की सीट पर बैठ गयी ।
दयाराम के तीनों बच्चे मौसी को मां के रूप में पाकर बेहद खुश थे । दयाराम अपने लम्बे चौडे घर में अकेला ही रहता था । शारदा के मरने के बाद उसने एक नौकर रख लिया था । जो उसके तीनों बच्चों और गाय बकरी आदि पशुओं की देखभाल करता था । दयाराम का यह पुश्तैनी मकान काफ़ी बडी जगह में बना हुआ था । जिसमें बडे बडे बाईस कमरे थे । इसके अतिरिक्त बाहर गली पार करके पशुओं के लिये एक अहाता था । और बारह कमरों का एक स्कूल बना हुआ था । जो अब बन्द था लेकिन दयाराम की सम्पत्ति था । दयाराम के एकदम बगल वाला घर किसी व्यवसायी का था । जिसे वह गोदाम के रूप में इस्तेमाल करता था । और उसमें कोई रहता नहीं था । इसी तरह दूसरी साइड में भी लगभग आठ सौ मीटर की जगह खाली पडी थी । कुल मिलाकर दयाराम की वह विशाल हवेली आवादी के लिहाज से लगभग अकेली ही थी । कुसुम के शादी के बाद घर में पहली बार पैर रखते ही एक अजीव सा रहस्यमय वातावरण सृजित हो गया । जिस पर अनजाने में ही दयाराम का ध्यान नहीं गया । उस रात ही पहली बार दयाराम ने जब कुसुम से सम्भोग किया तो उसे कुसुम में एक अजीव सी ताकत का अहसास हुआ । वह पहले ही सम्भोग में शरमाने के बजाय निर्लज्ज सा व्यवहार कर रही थी । दो तीन बार उसने दयाराम को वहशी की तरह दबोच लिया था । दयाराम ने सोचा । कुसुम साली होने के नाते खुली हुयी है और अपनी ताकत दिखा रही है । उसे कुछ अजीव सा तो लगा पर तत्काल ही कोई बात उसकी समझ में नहीं आयी । अगली सुबह सब कुछ सामान्य था । कुसुम ने बडी दक्षता से घर संभाल लिया था और चुहलबाजी करती हुयी एक नयी पत्नी की तरह व्यवहार कर रही थी । दयाराम ने राहत की सांस ली । उसकी उजडी ग्रहस्थी फ़िर से बस चुकी थी ?
Quote:दयाराम ज्यादातर दिन भर घर से बाहर खेतो पर ही रहता था । इसलिये अगले ढाई साल तक वह अपने घर में फ़ैल चुके मायाजाल को नहीं जान सका था । हालाकि उसे कुछ था जो अजीव लगता था । पर वो कुछ क्या था । यह उसकी समझ से बाहर था । इन ढाई सालों में कुसुम के दो बच्चे हुये जो तीन चार महीने की अवस्था होते ही रहस्यमय तरीके से मर गये । कुसुम का व्यवहार अजीव था । इसका जिक्र उसके दोनों बडे बच्चों ने और उसके नौकर रूपलाल ने भी किया था । बच्चों के स्कूल जाते ही घर अकेला होते ही वह एकदम नंगी हो जाती थी और ज्यादातर नंगी ही रहती थी ।
उसे पानी के सम्पर्क में रहना बहुत अच्छा लगता था । गर्मियों में वह चार बार तक और सर्दियों में दो बार नहाती थी । दयाराम उससे सम्भोग करे या ना करे । वह रात में निर्वस्त्र ही रहती थी । दयाराम के पूछने पर उसने कहा कि कपडों में वह घुटन महसूस करती है । एक अजीव बात जिसने दयाराम को सबसे ज्यादा चौंकाया था । कि उसने अपने बच्चों को स्तनपान नहीं कराया । इसका कारण उसने यह बताया कि उसकी छातिंयो में दूध उतरता नहीं है ।
रूपलाल के इशारा करने पर दयाराम ने गौर किया कि वह पलक नहीं झपकाती । अर्थात उसकी आंखे किसी पत्थर की मूर्ति की तरह अपलक ही रहती हैं । रूपलाल ने यह भी बताया कि कभी वो गलती से उसकी नंगी हालत में घर में आ गया तो भी उसने कपडे पहनने या कमरे में जाने की कोशिश नहीं की । रूपलाल बाहर स्कूल में रहता था इसलिये काम पडने पर ही घर में आता जाता था । ढाई साल बाद इस तरह के अजीव समाचार सुनकर दयाराम मानों सोते से जागा । जिन बातों को वह अब तक नजर अन्दाज कर रहा था । उनके पीछे कोई खतरनाक रहस्य छिपा हुआ था । यानी पानी सिर से ऊपर जा रहा था । वह अपने बच्चों की खातिर चिंतित हो उठा । जाने क्यों उसे अपनी ये हवेली रहस्यमय और खतरनाक लगने लगी । उसे एक अदृश्य मायाजाल का अहसास होने लगा । यही सोच विचार करते हुये उसने घर में अधिक समय बिताने का निश्चय किया । और तब उसने दो स्पष्ट प्रमाण देखे ।
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09-26-2012, 05:54 PM
Post: #8
RE: प्रेतनी का मायाजाल
पहला जब वह बाथरूम के शीशे के सामने शेव कर रहा था । कुसुम उसके ठीक पीछे आकर खडी हो गयी । उसके पुष्ट उरोज दयाराम की पीठ से सटे हुये थे । और उसके दोनों हाथ दयाराम के " अंग " को खोज रहे थे । पर ..? पर शीशे में उसकी कोई आकृति नहीं थी जो कि उस बडे आकार के शीशे में निश्चित होनी चाहिये थी । दयाराम इस रहस्य को अपने दिल में ही छुपा गया । उसने कुसुम से कुछ नहीं कहा । लेकिन अब वह कुसुम से मन ही मन भयभीत रहने लगा । खास तौर पर वह अपने छोटे छोटे बच्चों के लिये चिंतित हो उठा था ।
दूसरा प्रमाण भी उसे जल्दी ही मिल गया । वह दोपहर के टाइम छत पर था । जब कुसुम सूखे कपडे उतारने छत पर आयी । दयाराम और कुसुम एक ही स्थिति में खडे थे । लेकिन सूर्य की रोशनी में छाया सिर्फ़ दयाराम की बन रही थी । कुसुम किसी भी कोण से खडी हो । उसकी छाया नहीं बन रही थी । उफ़ ! दयाराम के पूरे शरीर में अग्यात भय की सिहरन हो उठी । उसके जैसा हिम्मती जिगरवाला भी कांप उठा । " भूतनी..? " कुसुम तो औरत के रूप में प्रेत थी ? वह अब तक एक प्रेतनी के साथ रह रहा था । कुसुम नीचे चली गयी । तो दयाराम कुसुम के साथ गुजारे अपने जिंदगी के क्षणों में वह रहस्य खोजने की कोशिश करने लगा । जब जब उसने कुसुम में कोई अजीब बात देखी हो । एक हिसाव से सभी बातें अजीव थी लेकिन उन्हें किसी औरत का विशेष स्वभाव मानों तो कुछ भी अजीव नहीं था ।
" हे भगवन । " उसने असमंजस में माथा रगडा,
" तेरे खेल कितने अजीव हैं । तेरे खेल कितने न्यारे हैं । इसको भला तेरे अलावा कौन समझ सकता है ? "
रात और अधिक गहरा चली थी । अपनी कहानी सुनाते सुनाते दयाराम भावुक हो उठा था । जिंदगी की अजीव और रहस्यमय परिस्थियों ने इस धनी सम्पन्न और जीवट इंसान को लगभग तोडकर रख दिया था । वह अपने मासूम बच्चों का मुंह देखकर हार जाता था । वरना तो वह गोली मारकर कब का इस भूतनी का खेल खत्म कर चुका होता । पर उसके सामने और भी सवाल थे । वह अपनी सास को क्या बताता । वह समाज को क्या बताता । दूसरे उसे खुद यह रहस्य मारे डाल रहा था कि अच्छी भली कुसुम आखिर प्रेत कैसे बन गयी ? वह जब अपनी ससुराल जाता था । वो एक सामान्य औरत की तरह व्यवहार करती । उससे जीजा जीजा कहकर खूब हंसी मजाक करती । उस समय उसमें ऐसी कोई बात नहीं थी । पहली विदा के समय बगिया में जो अजीव स्वप्न सा उसने देखा था । उसका क्या रहस्य था । ये कुछ ऐसे सवाल थे । जो उसे जीने पर मजबूर कर रहे थे । लडने पर मजबूर कर रहे थे । वरना तो ऐसी जिंदगी से वह अब मर जाना ही चाहता था । इस प्रेतनी का उद्देश्य क्या था । और ये कौन थी । जिसने उसकी हंसते खेलते घर को आग लगाकर रख दी थी ।
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09-26-2012, 05:54 PM
Post: #9
RE: प्रेतनी का मायाजाल
आखिर दयाराम ने रात में उसका पीछा करने का निश्चय किया । और भरी हुयी रिवाल्वर के साथ वह इंतजार करने लगा कि कब वह रात को बाहर जाय । इंतजार की आवश्यकता ही न पडी । कुसुम लगभग हर रात ही बाहर जाती थी । रात के बारह बजते ही कुसुम उठी । और दयाराम पर एक दृष्टि डालकर घर से बाहर निकल गयी । दयाराम बेहद फ़ुर्ती से उठा । उसने रिवाल्वर खोंसा । और अहाते में आ गया । जहां कुसुम बाउंड्रीबाल के पास खडी सडक की तरफ़ देख रही थी । मानों किसी का इंतजार कर रही हो । और फ़िर वह बेहद फ़ुर्ती से दीवाल पर चडकर लहराई और सडक पर कूद गयी । दयाराम अपनी पूर्ण शक्ति से उसका पीछा कर रहा था । लेकिन वह मानों चल न रही हो । हवा में उड रही हो । दयाराम के लिये उसका पीछा करना मुश्किल हो रहा था । कुछ ही देर में उसने बस्ती छोडकर पीपराघाट का रास्ता पकड लिया । और दयाराम एकदम चकरा गया । उस सडक पर जो पीपराघाट से नदी के पार वीरान टेकरी पर ले जाती थी । उसकी गति और भी बड गयी । और फ़िर मानों वह उडन छू हो गयी ।
दयाराम को दूर दूर तक वह नजर नहीं आयी । दाता क्या माजरा था । उसकी अच्छी तरह से समझ में आ गया था । कि उसकी चाल इंसानी चाल हरगिज नहीं थी । और कोई भी इंसान इंसानी गति से उसे कभी नहीं पकड सकता था । उसका ये मन्सूबा भी फ़ेल हो गया था । कि आखिर ये कहां जाती है और क्या करती है । दयाराम का मन हुआ कि इन अजीब परिस्थितियों में अपने बाल नोच ले ।
Quote:आखिरकार दयाराम को इस समस्या का हल भी मिल गया । मंगलवार की शाम जब वह हनुमान मन्दिर पर प्रसाद चडाने गया । उसे मन्दिर के बाहर दो बुजुर्ग आदमी बात करते हुये मिले जो किसी पिलुआ वाले सिद्ध अघोरी की बात कर रहे थे । जो यमुना के खादरों में रहता था और रात के दस बजे के बाद ही मिलता था । दयाराम ने उन आदमियों से पिलुआ का सही पता पूछा और उसी रात पिलुआ पहुंचा । यह अच्छा था कि खादर होने के बाद भी मोटर साइकिल आराम से वहां तक जाती थी । पिलुआ पहुंचकर दयाराम को बेहद आश्चर्य हुआ । वो जानता था कि अकेला वही प्रेत समस्या से जूझ रहा है । जबकि वहां इस तरह की समस्या और अन्य समस्याओं वाले लगभग चालीस लोग मौजूद थे । जिनमें आठ महिलाएं भी थी । दयाराम का नम्बर रात दो बजे सबके बाद आया । अघोरी ने बडे शान्त होकर उसकी बात सुनी । वह थोडा चिंतित भी दिख रहा था । फ़िर अघोरी ने अपनी विधा का उपयोग करते हुये बताया कि कुसुम रात को अक्सर तीन स्थानों पर ही जाती है । काली टेकरी । पलेवा मन्दिर जो खन्डित हो चुका था और कलियारी शमशान । जिसमें कलियारी शमशान वह अधिक जाती थी । अघोरी ने बताया कि कुसुम पूरी तरह प्रेत ग्रस्त हो चुकी है । और यदि वह यहां गद्दी पर आ जाय तो वह उसकी कुछ सहायता करसकता था । वरना वह घर में नहीं जा सकता था । दयाराम ने बहुत उसके हाथ पैर जोडे । पर अघोरी ने कहा कि वह मजबूर है । दूसरे अघोरी ने एकरहस्यमय बात ये भी कही कि कुसुम के प्रेत बाधा से मुक्त हो जाने पर भी कोई लाभ नहीं होने वाला था क्योंकि.....?
पिलुआ पहुंचने का एक सबसे बडा लाभ दयाराम को ये हुआ कि अघोरी के पास किसी श्रद्धालु का दिया हुआ मोबायल फ़ोन था । जिसके जरिये वह कभी भी अघोरी से बात कर सकता था और इसका खास फ़ायदा उसे ये मिलने वाला था । कि अघोरी बाबा उसे एन टाइम पर बता सकता था । कि कुसुम उस वक्त कहां है ? उसने कुसुम का फ़ोटो बाबा के पास जमा कर दिया । उसे अघोरी की रहस्यमय बातें समझ में नहीं आ रही थी । अघोरी ने उसे प्रेत बाधा से मुक्त कराने में कुछ खास रुचि नहीं दिखाई थी । अघोरी को ऐसा क्या राज पता चला । जिसके बाद वह कुसुम के मामले से उदासीन हो गया था । दयाराम पागल सा होने लगा । गुत्थी सुलझने के बजाय दिन पर दिन उलझती ही जा रही थी । फ़िर अगले मौके पर दयाराम ने जो देखा । उससे उसका दिमाग ही घूमकर रह गया । अघोरी ने फ़ोन पर बताया कि आज रात एक बजे कुसुम काली टेकरी पर जायेगी । बाबा की बात आजमाने के उद्देश्य से दयाराम कुसुम का पीछा करने के स्थान पर काली टेकरी से पहले ही एक स्थान पर जाकर छुप गया ।
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09-26-2012, 05:55 PM (This post was last modified: 09-26-2012 05:55 PM by Sex-Stories.)
Post: #10
RE: प्रेतनी का मायाजाल
उस समय रात के बारह बजने वाले थे । दयाराम सशंकित ह्रदय से कुसुम का इंतजार कर रहा था । ठीक पौन बजे कुसुम एक हवा के झोंके के समान आयी । वह एकदम नंगी थी । कुछ देर तक इधर उधर देखने के बाद वह चिता जलने के स्थान पर लोटने लगी । दयाराम के दिमाग में मानों भयंकर विस्फ़ोट हुआ । कुसुम गायब हो गयी थी और अब उसके स्थान पर एक लोमडी और सियार के मिले जुले रूप वाला छोटा जानवर नजर आ रहा था । दयाराम का दिमाग इस दृश्य को देखते ही मानों आसमान में चक्कर काटने लगा । अब वह सोचने समझने की स्थिति में नहीं था । उसने रिवाल्वर निकाला और जानवर को लक्ष्य करके फ़ायर कर दिया । मगर जानवर तो अपने स्थान से गायब हो चुका था ।
मैं ( प्रसून ) एक झटके से उठकर खडा हो गया । ये आदमी वाकई मुसीवत में था । मेरे अनुमान से ज्यादा मुसीवत । अब मैं समझ गया कि अघोरी ने उसकी सहायता से क्यों इंकार कर दिया था ? शिव के नाम की बात करने वाले अक्सर अघोरी वास्तव में " मसान " पूजक होते है । और ये आसानी से मसान को सिद्ध कर छोटे मोटे चमत्कार दिखाते हैं । दयाराम ने कुसुम के द्वारा जो रूप बदलने की बात कही थी और जिस तरह रूप बदलने की बात कही थी । वह मसान का ही काम था । इस तरह अघोरी मसान से प्रभावित उस परिवार को नहीं छुडा सकता था । क्योंकि वे खुद ही ज्यादातर मसान से काम लेते हैं और ऐसी स्थिति में मामला बिगड सकता था । अतः यह अघोरी के बस का मामला था ही नहीं । और इसीलिये जटाधारी जैसा छोटा साधक कोई भी " पंगा " लिये बिना ही निकल गया ।
" कंकाल कालिनी विधा " और " हाकिनी विधा " ये दो विधा या एक तरह से सिद्धियां होती हैं । कंकाल कालिनी में अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों की आयु को साधक अपनी या किसी की आयु में बदल सकता है । इसी की निकटवर्ती हाकिनी विध्या होती है । जिसमें हजारों मील दूर की बात जानी जा सकती है । हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति को बुलाया जा सकता है । आम आदमी को ये जादू जैसे चमत्कार करने वाली विध्याएं बहुत आकर्षित करती हैं । पर इनका मोल बहुत चुकाना होता है और इनका अंत तो निश्चय ही पतनकारक होता है । मेरे दृष्टिकोण से साधारण मन्दिरों में की जाने वाली भक्ति इससे कहीं ज्यादा अच्छी होती है । द्वैत की सही साधनाओं में इन विध्याओं का कोई महत्व नहीं होता । अब मुझे दयाराम की कहानी सुनने में कोई रुचि नहीं थी । पूरा खेल मेरी समझ में आ चुका था । लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी उठ खडे हुये थे । जिनका कोई उचित तरीका मुझे नहीं सूझ रहा था । मैं आखिर दयाराम की सहायता करूं तो कैसे करूं ? क्या कुसुम अभी जीवित थी । मेरे ख्याल से नहीं । कुसुम की लाश जो अभी चल फ़िर रही थी । उसका क्या किया जाय । और सबसे बडी बात दयाराम को कैसे समझाया जाय कि मैं इस केस को हल करना चाहता हूं ?
ऐसे और भी अनेको प्रश्न थे । जिनका उस वक्त कोई सही हल मुझे नहीं सूझ रहा था । सुबह के चार बजने वाले थे । पूरब दिशा में रोशनी धीरे धीरे बडती जा रही थी । मैंने एक सिगरेट सुलगाया और कलियारी कुटी को देखते हुये आगे के कदम के बारे में सोचने लगा । साथ ही ये विचार भी स्वतः ही मेरे दिमाग में आ रहे थे कि इसी प्रथ्वी पर किसी किसी के लिये जीवन कितना रहस्यमय हो जाता है । ऐसे मकडजाल में फ़ंसा आदमी या कोई परिवार ये तय नहीं कर पाता कि करे तो आखिर क्या करे ? जाय तो किसके पास जाय । अक्सर लोग डर की वजह से ऐसी स्थिति का जिक्र भी अपने परिचय वालों से नहीं करते क्योंकि दूसरे लोग भयभीत हो जाते हैं । और भूत प्रभावित परिवार से सम्पर्क ही खत्म कर देते हैं कि कहीं भूत उन पर हावी न हो जाय । मुख्य इसी कारण की बजह से जो भी प्रेत घटनायें होती हैं वो लोगों की निगाह में नहीं आ पाती ।
दयाराम पत्थर की शिला पर लेटा हुआ निर्विकार भाव से आसमान की ओर देख रहा था । उसे थोडी देर इंतजार करने की कहकर मैं कलियारी कुटी की तरफ़ निगाह बचाकर चला गया ।
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