Celebrity Sex Stories
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कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 11:54 AM

हाय, मैं अंजलि...! छोडो! नाम क्या रखा है? छिछोरे लड़कों को वेसे भी नाम से ज्यादा 'काम' से मतलब रहता है. इसीलिए सिर्फ 'काम' की ही बातें करूँगी.

मैं आज 22 की हो गयी हूँ. कुछ बरस पहले तक में बिल्कुल 'फ्लैट' थी.. आगे से भी.. और पीछे से भी. पर स्कूल बस में आते जाते; लड़कों के कंधों की रगड़ खा खा कर मुझे पता ही नहीं चला की कब मेरे कूल्हों और छातीयों पर चर्बी चढ़ गयी.. बाली उमर में ही मेरे चूतड़ बीच से एक फांक निकाले हुए गोल तरबूज की तरह उभर गये. मेरी छाती पर भगवान के दिये दो अनमोल 'फल' भी अब 'अमरूदों' से बढ़कर मोटी मोटी 'सेबों' जैसे हो गये थे. मैं कई बार बाथरूम में नंगी होकर अचरज से उन्हें देखा करती थी.. छू कर.. दबा कर.. मसल कर. मुझे ऐसा करते हुए अजीब सा आनंद आता .. 'वहाँ भी.. और नीचे भी.

मेरे गोरे चिट्टे बदन पर उस छोटी सी खास जगह को छोड़कर कहीं बालों का नामो-निशान तक नहीं था.. हल्के हल्के मेरी बगल में भी थे. उसके अलावा गरदन से लेकर पैरों तक मैं एकदम चिकनी थी. क्लास के लड़कों को ललचाई नजरों से अपनी छाती पर झूल रहे 'सेबों' को घूरते देख मेरी जाँघों के बीच छिपी बैठी हल्के हल्के बालों वाली, मगर चिकनाहट से भारी तितली के पंख फडफडाने लगते और छातीयों पर गुलाबी रंगत के अनारदाने' तन कर खड़े हो जाते. पर मुझे कोई फरक नहीं पड़ा. हाँ, कभी कभार शर्म आ जाती थी. ये भी नहीं आती अगर मम्मी ने नहीं बोला होता,"अब तू बड़ी हो गयी है अंजु.. ब्रा डालनी शुरू कर दे और चुन भी लिया कर!"

सच कहूँ तो मुझे अपने उन्मुक्त उरोजों को किसी मर्यादा में बांध कर रखना कभी नहीं सुहाया और न ही उनको चुन से परदे में रखना. मौका मिलते ही मैं ब्रा को जानाबूझ कर बाथरूम की खूँटी पर ही टांग जाती और क्लास में मनचले लड़कों को अपने इर्द गिर्द मंडराते देख मजे लेती.. मैं अक्सर जान बूझ अपने हाथ उपर उठा अंगडाई सी लेती और मेरी छातियाँ तन कर झूलने सी लगती. उस वक्त मेरे सामने खड़े लड़कों की हालत खराब हो जाती... कुछ तो अपने होंठों पर ऐसे जीभ फेरने लगते मानों मौका मिलते ही मुझे नोच डालेंगे. क्लास की सब लड़कियां मुझसे जलने लगी.. हालाँकि 'वो' सब उनके पास भी था.. पर मेरे जैसा नहीं..

मैं पढाई में बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी पर सभी मेल-टीचर्स का 'पूरा प्यार' मुझे मिलता था. ये उनका प्यार ही तो था की होम-वर्क न करके ले जाने पर भी वो मुस्कराकर बिना कुछ कहे चुपचाप कापी बंद करके मुझे पकड़ा देते.. बाकी सब की पिटाई होती. पर हाँ, वो मेरे पढाई में ध्यान न देने का हर्जाना वसूल करना कभी नहीं भूलते थे. जिस किसी का भी खाली पीरियड निकल आता; किसी न किसी बहाने से मुझे स्टाफरूम में बुला ही लेते. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर मसलते हुए मुझे समझाते रहते. कमर से चिपका हुआ उनका दूसरा हाथ धीरे धीरे फिसलता हुआ मेरे चूतड़ों पर आ टिकता. मुझे पढाई पर 'और ज्यादा' ध्यान देने को कहते हुए वो मेरे चूतड़ों पर हल्की हल्की चपत लगाते हुए मेरे चूतड़ों की थिरकन का मजा लुटते रहते.. मुझे पढाई के फायेदे गिनवाते हुए अक्सर वो 'भावुक' हो जाते थे, और चपत लगाना भूल चूतड़ों पर ही हाथ जमा लेते. कभी कभी तो उनकी उंगलियाँ स्कर्ट के उपर से ही मेरी 'दरार' की गहराई मापने की कोशिश करने लगती...

उनका ध्यान हर वक्त उनकी थपकियों के कारण लगातार थिरकती रहती मेरी छातीयों पर ही होता था.. पर किसी ने कभी 'उन' पर झपट्टा नहीं मारा. शायद 'वो' ये सोचते होंगे की कहीं में बिदक न जाऊँ.. पर मैं उनको कभी चाहकर भी नहीं बता पाई की मुझे ऐसा करवाते हुए मीठी-मीठी खुजली होती है और बहुत आनंद आता है...

हाँ! एक बात मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी.. मेरे हिस्ट्री वाले सर का हाथ ऐसे ही समझाते हुए एक दिन कमर से नहीं, मेरे घुटनों से चलना शुरू हुआ.. और धीरे धीरे मेरी स्कर्ट के अंदर घुस गया. अपनी केले के तने जैसी लंबी गोरी और चिकनी जाँघों पर उनके 'काँपते' हुए हाथ को महसूस करके मैं मचल उठी थी... खुशी के मारे मैंने आँखें बंद करके अपनी जांघें खोल दी और उनके हाथ को मेरी जाँघों के बीच में उपर चड़ता हुआ महसूस करने लगी.. अचानक मेरी फूल जैसी नाजुक चूत से पानी सा टपकने लगा..

अचानक उन्होंने मेरी जाँघों में बुरी तरह फंसी हुई 'कच्छी' के अंदर उंगली घुसा दी.. पर हड़बड़ी और जल्दबाजी में गलती से उनकी उंगली सीधी मेरी चिकनी होकर टपक रही चूत की मोटी मोटी फांकों के बीच घुस गयी.. मैं दर्द से तिलमिला उठी.. अचानक हुए इस प्रहार को मैं सहन नहीं कर पाई. छटपटाते हुए मैंने अपने आपको उनसे छुड़ाया और दीवार की तरफ मुँह फेर कर खड़ी हो गयी... मेरी आँखें डबडबा गयी थी..

मैं इस सारी प्रक्रिया के 'प्यार से' फिर शुरू होने का इंतजार कर ही रही थी की 'वो' मास्टर मेरे आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,"प्लीज अंजलि.. मुझसे गलती हो गयी.. मैं बहक गया था... किसी से कुछ मत कहना.. मेरी नौकरी का सवाल है...!" इससे पहले मैं कुछ बोलने की हिम्मत जुटाती; बिना मतलब की बकबक करता हुआ वो स्टाफरूम से भाग गया.. मुझे तडपती छोड़कर..


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 11:55 AM

निगोड़ी 'उंगली' ने मेरे यौवन को इस कदर भड़काया की मैं अपने जलवों से लड़कों के दिलों में आग लगाना भूल अपनी नन्ही सी फ़ुदकती चूत की प्यास भुझाने की जुगत में रहने लगी. इसके लिये मैंने अपने अंग-प्रदर्शन अभियान को और तेज कर दिया. अनजान सी बनकर, खुजली करने के बहाने मैं बेंच पर बैठी हुई स्कर्ट में हाथ डाल उसको जाँघों तक उपर खिसका लेती और क्लास में लड़कों की सीटियाँ बजने लगती. अब पूरे दिन लड़कों की बातों का केंद्र मैं ही रहने लगी. आज अहसास होता है की चूत में एक बार और मर्दानी उंगली करवाने के चक्कर में मैं कितनी बदनाम हो गयी थी.
खैर; मेरा 'काम' जल्द ही बन जाता अगर 'वो' (जो कोई भी था) मेरे बैग में निहायत ही अश्लील लैटर डालने से पहले मुझे बता देता. काश लैटर मेरे छोटू भैया से पहले मुझे मिल जाता! 'गधे' ने लैटर सीधा मेरे शराबी पापा को पकड़ा दिया और रात को नशे में धुत्त होकर पापा मुझे अपने सामने खड़ी करके लैटर पढ़ने लगे:

"हाय जाने-मन!

क्या खाती हो यार? इतनी मस्त होती जा रही हो की सारे लड़कों को अपना दीवाना बना के रख दिया. तुम्हारी 'पपीते' जैसे चूचियों ने हमें पहले ही पागल बना रखा था, अब अपनी गोरी चिकनी जांघें दिखा दिखा कर क्या हमारी जान लेने का इरादा है? ऐसे ही चलता रहा तो तुम अपने साथ 'इस' साल एक्साम में सब लड़कों को भी ले डूबोगी..

पर मुझे तुमसे कोई गिला नहीं है. तुम्हारी मस्तानी चूचियाँ देखकर मैं धन्य हो जाता था; अब नंगी चिकनी जांघें देखकर तो जैसे अमर ही हो गया हूँ. फिर पास या फेल होने की परवाह कीसे है अगर रोज तुम्हारे अंगों के दर्शन होते रहें. एक रीकुएस्ट है, प्लीज मान लेना! स्कर्ट को थोड़ा सा और उपर कर दिया करो ताकि मैं तुम्हारी गीली 'कच्छी' का रंग देख सकूं. स्कूल के बाथरूम में जाकर तुम्हारी कल्पना करते हुए अपने लंड को हिलाता हूँ तो बार बार यही सवाल मन में उभरता रहता है की 'कच्छी' का रंग क्या होगा.. इस वजह से मेरे लंड का रस निकलने में देरी हो जाती है और क्लास में टीचर्स की सुननी पड़ती है... प्लीज, ये बात आगे से याद रखना!

तुम्हारी कसम जाने-मन, अब तो मेरे सपनों में भी प्रियंका चोपड़ा की जगह नंगी होकर तुम ही आने लगी हो. 'वो' तो अब मुझे तुम्हारे सामने कुछ भी नहीं लगती. सोने से पहले 2 बार ख्यालों में तुम्हे पूरी नंगी करके चोदते हुए अपने लंड का रस निकालता हूँ, फिर भी सुबह मेरा 'कच्छा' गीला मिलता है. फिर सुबह बिस्तर से उठने से पहले तुम्हे एक बार जरूर याद करता हूँ.

मैंने सुना है की लड़कियों में चुदाई की भूख लड़कों से भी ज्यादा होती है. तुम्हारे अंदर भी होगी न? वैसे तो तुम्हारी चुदाई करने के लिये सभी अपने लंड को तेल लगाये फिरते हैं; पर तुम्हारी कसम जानेमन, मैं तुम्हे सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ, असली वाला. किसी और के बहकावे में मत आना, ज्यादातर लड़के चोदते हुए पागल हो जाते हैं. वो तुम्हारी कुंवारी चूत को एकदम फाड़ डालेंगे. पर मैं सब कुछ 'प्यार से करूँगा.. तुम्हारी कसम. पहले उंगली से तुम्हारी चूत को थोड़ी सी खोलूँगा और चाट चाट कर अंदर बाहर से पूरी तरह गीली कर दूँगा.. फिर धीरे धीरे लंड अंदर करने की कोशिश करूँगा, तुमने खुशी खुशी ले लिया तो ठीक, वरना छोड़ दूँगा.. तुम्हारी कसम जानेमन.

अगर तुमने अपनी चुदाई करवाने का मूड बना लिया हो तो कल अपना लाल रुमाल लेकर आना और उसको रिसेस में अपने बेंच पर छोड़ देना. फिर मैं बताऊंगा की कब कहाँ और कैसे मिलना है!

प्लीज जाना, एक बार सेवा का मौका जरूर देना. तुम हमेशा याद रखोगी और रोज रोज चुदाई करवाने की सोचोगी, मेरा दावा है.

तुम्हारा आशिक!
लैटर में शुद्ध 'कामरस' की बातें पढ़ते पढ़ते पापा का नशा कब काफूर हो गया, शायद उन्हें भी अहसास नहीं हुआ. सिर्फ इसीलिए शायद मैं उस रात कुंवारी रह गयी. वरना वो मेरे साथ भी वैसा ही करते जैसा उन्होंने बड़ी दीदी 'निम्मो' के साथ कुछ साल पहले किया था.

मैं तो खैर उस वक्त छोटी सी थी. दीदी ने ही बताया था. सुनी सुनाई बता रही हूँ. विश्वास हो तो ठीक वरना मेरा क्या चाट लोगे?


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 11:56 AM

पापा निम्मो को बालों से पकड़कर घसीटते हुए उपर लाये थे. शराब पीने के बाद पापा से उलझने की हिम्मत घर में कोई नहीं करता. मम्मी खड़ी खड़ी तमाशा देखती रही. बाल पकड़ कर 5-7 करारे झापड़ निम्मो को मारे और उसकी गरदन को दबोच लिया. फिर जाने उनके मन में क्या ख्याल आया; बोले," सजा भी वैसी ही होनी चाहिए जैसी गलती हो!" दीदी के कमीज को दोनों हाथों से गले से पकड़ा और एक ही झटके में तार तार कर डाला; कमीज को भी और दीदी की 'इज्जत' को भी. दीदी के मेरी तरह मस्ताये हुए गोल गोल कबूतर जो थोड़े बहुत उसके शमीज ने छुपा रखे थे; अगले झटके के बाद वो भी छुपे नहीं रहे. दीदी बताती हैं की पापा के सामने 'उनको' फडकते देख उन्हें खूब शर्म आई थी. उन्होंने अपने हाथों से 'उन्हें' छिपाने की कोशिश की तो पापा ने 'टीचर्स' की तरह उसको हाथ उपर करने का आदेश दे दिया.. 'टीचर्स' की बात पर एक और बात याद आ गयी, पर वो बाद में सुनाऊंगी....

हाँ तो मैं बता रही थी.. हाँ.. तो दीदी के दोनों संतरे हाथ उपर करते ही और भी तन कर खड़े हो गये. जैसे उनको शर्म नहीं गर्व हो रहा हो. दानों की नोक भी पापा की और ही घूर रही थी. अब भला मेरे पापा ये सब कैसे सहन करते? पापा के सामने तो आज तक कोई भी नहीं अकड़ा था. फिर वो कैसे अकड़ गये? पापा ने दोनों चूचियों के दानों को कसकर पकड़ा और मसल दिया. दीदी बताती हैं की उस वक्त उनकी चूत ने भी रस छोड़ दिया था. पर कम्बक्त 'कबूतरों' पर इसका कोई असर नहीं हुआ. वो तो और ज्यादा अकड़ गये.

फिर तो दीदी की खैर ही नहीं थी. गुस्से के मारे उन्होंने दीदी की सलवार का नाडा पकड़ा और खींच लिया. दीदी ने हाथ नीचे करके सलवार सँभालने की कोशिश की तो एक साथ कई झापड़ पड़े. बेचारी दीदी क्या करती? उनके हाथ उपर हो गये और सलवार नीचे. गुस्से गुस्से में ही उन्होंने उनकी 'कच्छी' भी नीचे खींच दी और घूरते हुए बोले," कुतिया! मुर्गी बन जा उधर मुँह करके".. और दीदी बन गयी मुर्गी.

हाय! दीदी को कितनी शर्म आई होगी, सोच कर देखो! पापा दीदी के पीछे चारपाई पर बैठ गये थे. दीदी जांघों और घुटनों तक निकली हुई सलवार के बीच में से सब कुछ देख रही थी. पापा उसके गोल मटोल चूतड़ों के बीच उनके दोनों छेदों को घूर रहे थे. दीदी की चूत की फांकें डर के मारे कभी खुल रही थी, कभी बंद हो रही थी. पापा ने गुस्से में उसके चूतड़ों को अपने हाथों में पकड़ा और उन्हें बीच से चीरने की कोशिश करने लगे. शुक्र है दीदी के चूतड़ सुडोल थे, पापा सफल नहीं हो पाये!

"किसी से मरवा भी ली है क्या कुतिया?" पापा ने थक हार कर उन्हें छोडते हुए कहा था.

दीदी ने बताया की मना करने के बावजूद उनको विश्वास नहीं हुआ. मम्मी से मोमबत्ती लाने को बोला. डरी सहमी दरवाजे पर खड़ी सब कुछ देख रही मम्मी चुपचाप रसोई में गयी और उनको मोमबत्ती लाकर दे दी.

जैसा 'उस' लड़के ने खत में लिखा था, पापा बड़े निर्दयी निकले. दीदी ने बताया की उनकी चूत का छेद मोटी मोमबत्ती की पतली नोक से ढूंढ कर एक ही झटके में अंदर घुसा दी. दीदी का सर सीधा जमीन से जा टकराया था और पापा के हाथ से छूटने पर भी मोमबत्ती चूत में ही फंसी रह गयी थी. पापा ने मोमबत्ती निकाली तो वो खून से लथपथ थी. तब जाकर पापा को यकीन हुआ की उनकी बेटी कुंवारी ही है (थी). ऐसा है पापा का गुस्सा!


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 11:56 AM

दीदी ने बताया की उस दिन और उस 'मोमबत्ती' को वो कभी नहीं भूल पाई. मोमबत्ती को तो उसने 'निशानी' के तौर पर अपने पास ही रख लिया.. वो बताती हैं की उसके बाद शादी तक 'वो' मोमबत्ती ही भारी जवानी में उनका सहारा बनी. जैसे अंधे को लकड़ी का सहारा होता है, वैसे ही दीदी को भी मोमबत्ती का सहारा था शायद

खैर, भगवान का शुक्र है मुझे उन्होंने ये कहकर ही बख्स दिया," कुतिया! मुझे विश्वास था की तू भी मेरी औलाद नहीं है. तेरी मम्मी की तरह तू भी रंडी है रंडी! आज के बाद तू स्कूल नहीं जायेगी" कहकर वो उपर चले गये.. थैंक गोद! मैं बच गयी. दीदी की तरह मेरा कुँवारापन देखने के चक्कर में उन्होंने मेरी सील नहीं तोड़ी.

लगे हाथों 'दीदी' की वो छोटी सी गलती भी सुन लो जिसकी वजह से पापा ने उन्हें इतनी 'सख्त' सज़ा दी...

दरअसल गली के 'कल्लू' से बड़े दिनों से दीदी की गुटरगू चल रही थी.. बस आँखों और इशारों में ही. धीरे धीरे दोनों एक दूसरे को प्रेमपत्र लिख लिख कर उनका 'जहाज' बना बना कर एक दूसरे की छतों पर फैंकने लगे. दीदी बताती हैं की कई बार 'कल्लू' ने चूत और लंड से भरे प्रेमपत्र हमारी छत पर उडाये और अपने पास बुलाने की प्राथना की. पर दीदी बेबस थी. कारण ये था की शाम 8:00 बजते ही हमारे 'सरियों' वाले दरवाजे पर ताला लग जाता था और चाबी पापा के पास ही रहती थी. फिर न कोई अंदर आ पता था और न कोई बाहर जा पता था. आप खुद ही सोचिये, दीदी बुलाती भी तो बुलाती कैसे?

पर एक दिन कल्लू तैश में आकर सन्नी देओल बन गया. 'जहाज' में लिख भेजा की आज रात अगर 12:00 बजे दरवाजा नहीं खुला तो वो सरिये उखाड़ देगा. दीदी बताती हैं की एक दिन पहले ही उन्होंने छत से उसको अपनी चूत, चूचियाँ और चूतड़ दिखाये थे, इसीलिए वह पगला गया था, पागल!

दीदी को 'प्यार' के जोश और जज्बे की परख थी. उनको विश्वास था की 'कल्लू' ने कह दिया तो कह दिया. वो जरूर आयेगा.. और आया भी. दीदी 12 बजने से पहले ही कल्लू को मनाकर दरवाजे के 'सरिये' बचाने नीचे पहुँच चुकी थी.. मम्मी और पापा की चारपयीइओं के पास डाली अपनी चारपाई से उठकर!

दीदी के लाख समझाने के बाद वो एक ही शर्त पर मना "चूस चूस कर निकालना पड़ेगा!"

दीदी खुश होकर मान गयी और झट से घुटने टिका कर नीचे बैठ गयी. दीदी बताती हैं की कल्लू ने अपना 'लंड' खड़ा किया और सरियों के बीच से दीदी को पकड़ा दिया.. दीदी बताती हैं की उसको 'वो' गरम गरम और चूसने में बड़ा खट्टा मीठा लग रहा था. चूसने चूसने के चक्कर में दोनों की आंख बंद हो गयी और तभी खुली जब पापा ने पीछे से आकर दीदी को पीछे खींच लंड मुश्किल से बाहर निकलवाया.

पापा को देखते ही घर के सरिये तक उखाड़ देने का दावा करने वाला 'कल्लू देओल' तो पता ही नहीं चला कहाँ गायब हुआ. बेचारी दीदी को इतनी बड़ी सजा अकेले सहन करनी पड़ी. साला कल्लू भी पकड़ा जाता और उसके छेद में भी मोमबत्ती घुसती तो उसको पता तो चलता मोमबत्ती अंदर डलवाने में कितना दर्द होता है.

खैर, हर रोज की तरह स्कूल के लिये तैयार होने का टाइम होते ही मेरी कासी हुई छातियाँ फडकने लगी; 'शिकार' की तलाश का टाइम होते ही उनमे अजीब सी गुदगुदी होने लग जाती थी. मैंने यही सोचा था की रोज की तरह रात की वो बात तो नशे के साथ ही पापा के सर से उतर गयी होगी. पर हाय री मेरी किस्मत; इस बार ऐसा नहीं हुआ," किसलिए इतनी फुदक रही है? चल मेरे साथ खेत में!"

"पर पापा! मेरे एक्साम सर पर हैं!" बेशर्म सी बनते हुए मैंने रात वाली बात भूल कर उनसे बहस की.

पापा ने मुझे उपर से नीचे तक घूरते हुए कहा," ये ले उठा टोकरी! हो गया तेरा स्कूल बस! तेरी हाजिरी लग जायेगी स्कूल में! रामफल के लड़के से बात कर ली है. आज से कॉलेज से आने के बाद तुझे यहीं पढ़ा जाया करेगा! तैयारी हो जाये तो पेपर दे देना. अगले साल तुझे गर्ल’स स्कूल में डालूँगा. वहाँ दिखाना तू कच्छी का रंग!" आखिरी बात कहते हुए पापा ने मेरी और देखते हुए जमीन पर थूक दिया. मेरी कच्छी की बात करने से शायद उनके मुँह में पानी आ गया होगा.

काम करने की मेरी आदत तो थी नहीं. पुराना सा लहंगा पहने खेत से लौटी तो बदन की पोर पोर दुःख रही थी. दिल हो रहा था जैसे कोई मुझे अपने पास लिटाकर आटे की तरह गूंथ डाले. मेरी उपर जाने तक की हिम्मत नहीं हुई और नीचे के कमरे में चारपाई को सीधा करके उस पर पसरी और सो गयी.


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 11:59 AM

रामफल का लड़के ने घर में घुस कर आवाज दी. मुझे पता था की घर में कोई नहीं है. फिर भी मैं कुछ न बोली. दरअसल पढ़ने का मेरा मन था ही नहीं, इसीलिए सोने का बहाना किये पड़ी रही. मेरे पास आते ही वो फिर बोला,"अंजलि!"

उसने 2-3 बार मुझको आवाज दी. पर मुझे नहीं उठना था सो नहीं उठी. हाय राम! वो तो अगले ही पल लड़कों वाली औकात पर आ गया. सीधा चूतड़ों पर हाथ लगाकर हिलाया,"अंजलि.. उठो न! पढ़ना नहीं है क्या?"

इस हरकत ने तो दूसरी ही पढाई करने की ललक मुझमे जगा दी. उसके हाथ का अहसास पेट ही मेरे चूतड़ सिकुड़ से गये. पूरा बदन उसके छूने से थिरक उठा था. उसको मेरे जाग जाने की ग़लतफ़हमी न हो जाये इसीलिए नींद में ही बडबडाने का नाटक करती हुई मैं उलटी हो गयी; अपने माँसल चूतड़ों की कसावट से उसको ललचाने के लिये.

सारा गाँव उस चश्मिश को शरीफ कहता था, पर वो तो बड़ा ही हरामी निकला. एक बार बाहर नजर मार कर आया और मेरे चूतड़ों से थोड़ा नीचे मुझसे सटकर चारपाई पर ही बैठ गया. मेरा मुँह दूसरी तरफ था पर मुझे यकीन था की वो चोरी चोरी मेरे बदन की कामुक बनावट का ही लुत्फ़ उठा रहा होगा!

"अंजलि!" इस बार थोड़ी तेज बोलते हुए उसने मेरे घुटनों तक के लहंगे से नीचे मेरी नंगी गुदाज़ पिंडलियों पर हाथ रखकर मुझे हिलाया और सरकाते हुए अपना हाथ मेरे घुटनों तक ले गया. अब उसका हाथ नीचे और लहंगा उपर था.
मुझसे अब सहन करना मुश्किल हो रहा था. पर शिकार हाथ से निकलने का डर था. मैं चुप्पी साधे रही और उसको जल्द से जल्द अपने पिंजरे में लाने के लिये दूसरी टांग घुटनों से मोड़ी और अपने पेट से चिपका ली. इसके साथ ही लहंगा उपर सरकता गया और मेरी एक जांघ काफी उपर तक नंगी हो गयी. मैंने देखा नहीं, पर मेरी कच्छी तक आ रही बाहर की ठंडी हवा से मुझे लग रहा था की उसको मेरी कच्छी का रंग दिखने लगा है.

"अ..अन्न्जली" इस बार उसकी आवाज में कंपकपाहट सी थी.. सिसक उठा था वो शायद! एक बार खड़ा हुआ और फिर बैठ गया.. शायद मेरा लहंगा उसके नीचे फंसा हुआ होगा. वापस बैठते ही उसने लहंगे को उपर पलट कर मेरी कमर पर डाल दिया..

उसका क्या हाल हुआ होगा ये तो पता नहीं. पर मेरी चूत में बुलबुले से उठने शुरू हो चुके थे. जब सहन करने की हद पार हो गयी तो मैं नींद में ही बनी हुई अपना हाथ मुड़ी हुई टांग के नीचे से ले जाकर अपनी कच्छी में उंगलियाँ घुसा 'वहाँ' खुजली करने करने के बहाने उसको कुरेदने लगी. मेरा ये हाल था तो उसका क्या हो रहा होगा? सुलग गया होगा न?

मैंने हाथ वापस खींचा तो अहसास हुआ जैसे मेरी चूत की एक फांक कच्छी से बाहर ही रह गयी है. अगले ही पल उसकी एक हरकत से मैं बौखला उठी. उसने झट से लहंगा नीचे सरका दिया. कम्बक्त ने मेरी सारी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया.

पर मेरा सोचन गलत साबित हुआ. वो तो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा शातिर निकला. एक आखिरी बार मेरा नाम पुकारते हुए उसने मेरी नींद को मापने की कोशिश की और अपना हाथ लहंगे के नीचे सरकाते हुए मेरे चूतड़ों पर ले गया....
कच्छी के उपर थिरकती हुई उसकी उँगलियों ने तो मेरी जान ही निकल दी. कसे हुए मेरे चिकने चूतड़ों पर धीरे धीरे मंडराता हुआ उसका हाथ कभी 'इसको' कभी उसको दबा कर देखता रहा. मेरी छातियाँ चारपाई में दबकर छटपटाने लगी थी. मैंने बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू पाया हुआ था..

अचानक उसने मेरे लहंगे को वापस उपर और धीरे से अपनी एक उंगली कच्छी में घुसा दी.. धीरे धीरे वह उंगली सरकती हुई पहले चूतड़ों की दरार में घूमी और फिर नीचे आने लगी.. मैंने दम साध रखा था.. पर जैसे ही उंगली मेरी 'फूलकुंवारी' की फांकों के बीच आई; मैं उछल पड़ी.. और उसी पल उसका हाथ वहाँ से हटा और चारपाई का बोझ कम हो गया..

मेरी छोटी सी मछली तड़प उठी. मुझे लगा, मौका हाथ से गया.. पर इतनी आसानी से मैं भी हार मानने वालों में से नहीं हूँ... अपनी सिसकियों को नींद की बडबडाहट में बदल कर मैं सीधी हो गयी और आँखें बंद किये हुए ही मैंने अपनी जांघें घुटनों से पूरी तरह मोड़ कर एक दूसरी से विपरीत दिशा में फैला दी. अब लहंगा मेरे घुटनों से उपर था और मुझे विश्वास था की मेरी भीगी हुई कच्छी के अंदर बैठी 'छम्मक छल्लो' ठीक उसके सामने होगी.

थोड़ी देर और यूँही बडबडाते हुए मैं चुप हो कर गहरी नींद में होने का नाटक करने लगी. अचानक मुझे कमरे की चिटकनी बंद होने की आवाज आई. अगले ही पल वह वापस चारपाई पर ही आकर बैठ गया.. धीरे धीरे फिर से रेंगता हुआ उसका हाथ वहीं पहुँच गया. मेरी चूत के उपर से उसने कच्छी को सरकाकर एक तरफ कर दिया. मैंने हल्की सी आँखें खोलकर देखा. उसने चश्मा नहीं पहने हुए थे. शायद उतार कर एक तरफ रख दिये होंगे. वह आँखें फाड़े हुए मेरी फडकती हुई चूत को ही देख रहा था. उसके चेहरे पर उत्तेजना के भाव अलग ही नजर आ रहे थे..

अचानक उसने अपना चेहरा उठाया तो मैंने अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर ली. उसके बाद तो उसने मुझे हवा में ही उड़ा दिया. चूत की दोनों फांकों पर मुझे उसके दोनों हाथ महसूस हुए. बहुत ही आराम से उसने अपने अँगूठे और उँगलियों से पकड़ कर मोटी मोटी फांकों को एक दूसरी से अलग कर दिया. जाने क्या ढूंढ रहा था वह अंदर. पर जो कुछ भी कर रहा था, मुझसे सहन नहीं हुआ और मैंने काँपते हुए जांघें भींच कर अपना पानी छोड़ दिया.. पर आश्चर्यजनक ढंग से इस बार उसने अपने हाथ नहीं हटाये...

किसी कपड़े से (शायद मेरे लहंगे से ही) उसने चूत को साफ़ किया और फिर से मेरी चूत को चौड़ा कर लिया. पर अब झड जाने की वजह से मुझे नोर्मल रहने में कोई खास दिक्कत नहीं हो रही थी. हाँ, मजा अब भी आ रहा था और मैं पूरा मजा लेना चाहती थी.

अगले ही पल मुझे गरम सांसें चूत में घुसती हुई महसूस हुई और पागल सी होकर मैंने वहाँ से अपने आपको उठा लिया.. मैंने अपनी आँखें खोल कर देखा. उसका चेहरा मेरी चूत पर झुका हुआ था.. मैं अंदाज़ा लगा ही रही थी की मुझे पता चल गया की वो क्या करना चाहता है. अचानक वो मेरी चूत को अपनी जीभ से चाटने लगा.. मेरे सारे बदन में झुरझुरी सी उठ गयी..इस आनंद को सहन न कर पाने के कारण मेरी सिसकी निकल गयी और मैं अपने चूतड़ों को उठा उठा कर पटकने लगी...पर अब वो डर नहीं रहा था... मेरी जाँघों को उसने कसकर एक जगह दबोच लिया और मेरी चूत के अंदर जीभ घुसा दी..

"आआह!" बहुत देर से दबाये रखा था इस सिसकी को.. अब दबी न रह सकी.. मजा इतना आ रहा था की क्या बताऊँ... सहन न कर पाने के कारण मैंने अपना हाथ वहाँ ले जाकर उसको वहाँ से हटाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया," कुछ नहीं होता अंजलि.. बस दो मिनट और!" कहकर उसने मेरी जाँघों को मेरे चेहरे की तरफ धकेल कर वहीं दबोच लिया और फिर से जीभ के साथ मेरी चूत की गहराई मापने लगा...

हाय राम! इसका मतलब उसको पता था की मैं जाग रही हूँ.. पहले ये बात बोल देता तो मैं क्यूँ घुट घुट कर मजे लेती, मैं झट से अपनी कोहनी चारपाई पर टेक कर उपर उठ गयी और सिसकते हुए बोली," आआह...जल्दी करो न.. कोई आ जायेगा नहीं तो!"

फिर क्या था.. उसने चेहरा उपर करके मुस्कराते हुए मेरी और देखा.. उसकी नाक पर अपनी चूत का गाढ़ा पानी लगा देखा तो मेरी हँसी छूट गयी.. इस हँसी ने उसकी झिझक और भी खोल दी.. झट से मुझे पकड़ कर नीचे उतारा और घुटने जमीन पर टिका मुझे कमर से उपर चारपाई पर लिटा दिया..," ये क्या कर रहे हो?"

"टाइम नहीं है अभी बताने का.. बाद में सब बता दूँगा.. कितनी रसीली है तू हाय.. अपनी गांड को थोड़ा उपर कर ले.."

"पर कैसे करूँ?.. मेरे तो घुटने जमीन पर टिके हुए हैं..?"

"तू भी न.. !" उसको गुस्सा सा आया और मेरी एक टांग चारपाई के उपर चढ़ा दी.. नीचे तकिया रखा और मुझे अपना पेट वहाँ टिका लेने को बोला.. मैंने वैसा ही किया..

"अब उठाओ अपने चूतड़ उपर.. जल्दी करो.." बोलते हुए उसने अपना मूसल जैसा लंड पेंट में से निकल लिया..

मैं अपने चूतड़ों को उपर उठाते हुए अपनी चूत को उसके सामने परोसा ही था की बाहर पापा की आवाज सुनकर मेरा दम निकल गया," पापा !" मैं चिल्लाई....
"दो काम क्या कर लिये; तेरी तो जान ही निकल गयी.. चल खड़ी हो जा अब! नहा धो ले. 'वो' आने ही वाला होगा... पापा ने कमरे में घुसकर कहा और बाहर निकल गये,"जा छोटू! एक 'अद्धा' लेकर आ!"

हाय राम! मेरी तो सांसें ही थम गयी थी. गनीमत रही की सपने में मैंने सचमुच अपना लहंगा नहीं उठाया था. अपनी छातीयों को दबाकर मैंने 2-4 लंबी लंबी सांसें ली और लहंगे में हाथ डाल अपनी कच्छी को चेक किया. चूत के पानी से वो नीचे से तर हो चुकी थी. बच गयी!


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 12:00 PM

रगड़ रगड़ कर नहाते हुए मैंने खेत की मिट्टी अपने बदन से उतारी और नई नवेली कच्छी पहन ली जो मम्मी 2-4 दिन पहले ही बाजार से लायी थी," पता नहीं अंजु! तेरी उमर में तो मैं कच्छी पहनती भी नहीं थी. तेरी इतनी जल्दी कैसे खराब हो जाती है" मम्मी ने लाकर देते हुए कहा था.

मुझे पूरी उम्मीद थी की रामफल का लड़का मेरा सपना साकर जरूर करेगा. इसीलिए मैंने स्कूल वाली स्कर्ट डाली और बिना ब्रा के शर्ट पहनकर बाथरूम से बाहर आ गयी.

"जा वो नीचे बैठे तेरा इंतज़ार कर रहे हैं.. कितनी बार कहा है ब्रा डाल लिया कर; निकम्मी! ये हिलते हैं तो तुझे शर्म नहीं आती?" मम्मी की इस बात को मैंने नज़रंदाज़ किया और अपना बैग उठा सीढियों से नीचे उतरती चली गयी.

नीचे जाकर मैंने उस चश्मू के साथ बैठी पड़ोस की रिंकी को देखा तो मेरी समझ में आया की मम्मी 'बैठा है' की जगह 'बैठे हैं' क्यूँ कहा था. मेरा तो मूड ही खराब हो गया

"तुम किसलिए आई हो?" मैंने रिंकी से कहा और चश्मू को अभिवादन के रूप में दांत दिखा दिये.

उल्लू की दुम हँसा भी नहीं मुझे देखकर," चेअर नहीं हैं क्या?"

"मैं भी यहीं पढ़ लिया करूँगी.. भैया ने कहा है की अब रोज यहीं आना है. पहले मैं भैया के घर जाती थी पढ़ने.. " रिंकी की सुरीली आवाज ने भी मुझे डंक सा मारा...

"कौन भैया?" मैंने मुँह चढ़ा कर पूछा!

"ये.. तरुण भैया! और कौन? और क्या इनको सर कहेंगे? 4-5 साल ही तो बड़े हैं.." रिंकी ने मुस्कराते हुए कहा..

हाय राम! जो थोड़ी देर पहले सपने में 'सैयां' बनकर मेरी 'फूलझडी' में जीभ घुमा रहा था; उसको क्या अब भैया कहना पड़ेगा? न! मैंने न कहा भैया

" मैं तो सर ही कहूँगी! ठीक है न, तरुण सर?"

बेशर्मी से मैं चारपाई पर उसके सामने पसर गयी और एक टांग सीधी किये हुए दूसरी घुटने से मोड़ अपनी छाती से लगा ली. सीधी टांग वाली चिकनी जांघ तो मुझे उपर से ही दिखाई दे रही थी.. उसको क्या क्या दिख रहा होगा, आप खुद ही सोच लो.

"ठीक से बैठ जाओ! अब पढ़ना शुरू करेंगे.. " हरामी ने मेरी जन्नत की और देखा तक नहीं और खुद एक तरफ हो रिंकी को बीच में बैठने की जगह दे दी.. मैं तो सुलगती रह गयी.. मैंने आलथी पालथी मार कर अपना घुटन जलन की वजह से रिंकी की कोख में फंसा दिया और आगे झुक कर रोनी सूरत बनाये कापी की और देखने लगी...

एक डेढ़ घंटे में जाने कितने ही सवाल निकल दिये उसने, मेरी समझ में तो खाक भी नहीं आया.. कभी उसके चेहरे पर मुस्कराहट को कभी उसकी पेंट के मरदाना उभर को ढूंढती रही, पर कुछ नहीं मिला..

पढ़ाते हुए उसका ध्यान एक दो बार मेरी छातीयों की और हुआ तो मुझे लगा की वो 'दूध' का दीवाना है. मैंने झट से उसकी सुनते सुनते अपनी शर्ट का बीच वाला एक बटन खोल दिया. मेरी गदराई हुई छातियाँ, जो शर्ट में घुटन महसूस कर रही थी; रास्ता मिलते ही उस और सरक कर सांस लेने के लिये बाहर झाँकने लगी.. दोनों में बाहर निकलने की मची होड़ का फायदा उनके बीच की गहरी घाटी को हो रहा था, और वह बिल्कुल सामने थी.

तरुण ने जैसे ही इस बार मुझसे पूछने के लिये मेरी और देखा तो उसका चेहरा एकदम लाल हो गया.. हडबडाते हुए उसने कहा," बस! आज इतना ही.. मुझे कहीं जान है... कहते हुए उसने नजरें चुराकर एक बार और मेरी गोरी छातीयों को देखा और खड़ा हो गया....

हद तो तब हो गयी, जब वो मेरे सवाल का जवाब दिये बिना निकल गया.

मैंने तो सिर्फ इतना ही पूछा था," मजा नहीं आया क्या, सर?"


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 12:01 PM

सपने में ही सही, पर बदन में जो आग लगी थी, उसकी दहक से अगले दिन भी मेरा अंग - अंग सुलग रहा था. जवानी की तड़प सुनाती तो सुनाती किसको! सुबह उठी तो घर पर कोई नहीं था.. पापा शायद आज मम्मी को खेत में ले गये होंगे.. हफ्ते में 2 दिन तो कम से कम ऐसा होता ही था जब पापा मम्मी के साथ ही खेत में जाते थे..

उन दो दिनों में मम्मी इस तरह सजधज कर खाना साथ लेकर जाती थी जैसे खेत में नहीं, कहीं बुड्ढे बुढियों की सौंदर्य प्रतियोगिता में जा रही हों.. मजाक कर रही हूँ... मम्मी तो अब तक बुड्ढी नहीं हुई हैं.. 40 की उमर में भी वो बड़ी दीदी की तरह रसीली हैं.. मेरा तो खैर मुकाबला ही क्या है..?

खैर; मैं भी किन बातों को उठा लेती हूँ... हाँ तो मैं बता रही थी की अगले दिन सुबह उठी तो कोई घर पर नहीं था... खाली घर में खुद को अकेली पाकर मेरी जाँघों के बीच सुरसुरी सी मचने लगी.. मैंने दरवाजा अंदर से बंद किया और चारपाई पर आकर अपनी जाँघों को फैलाकर स्कर्ट पूरी तरह उपर उठा लिया..

मैं देखकर हैरत मैं पड़ गयी.. छोटी सी मेरी चूत किसी बड़े पाव की तरह फूल कर मेरी कच्छी से बाहर निकलने को उतावली हो रही थी... मोटी मोटी चूत की पत्तियां संतरे की फांकों की तरह उभर कर कच्छी के बाहर से ही दिखाई दे रही थी... उनके बीच की झिर्री में कच्छी इस तरह अंदर घुसी हुई थी जैसे चूत का दिल कच्छी पर ही आ गया हो...

डर तो किसी बात का था ही नहीं... मैं लेटी और चूतड़ों को उकसाते हुए कच्छी को उतार फैंका और वापस बैठकर जाँघों को फिर दूर दूर कर दिया... हाय! अपनी ही चूत के रसीलेपन और जाँघों तक पसर गयी चिकनाहट को देखते ही मैं मदहोश सी हो गयी..

मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी उँगलियों से चूत की संतरिय फांकों को सहला कर देखा.. फांकों पर उगे हुए हल्के हल्के भूरे रंग के छोटे छोटे बाल उत्तेजना के मारे खड़े हो गये.. उनपर हाथ फेरने से मुझे चूत के अंदर तक गुदगुदी और आनंद का अहसास हो रहा था.... चूत पर उपर नीचे उँगलियों से क्रीड़ा सी करती हुई मैं बदहवास सी होती जा रही थी.. फांकों को फैलाकर मैंने अंदर झाँकने की कोशिश की; चिकनी चिकनी लाल त्वचा के अलावा मुझे और कुछ दिखाई न दिया... पर मुझे देखना था......

मैं उठी और बेड पर जाकर ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ गयी.. हाँ.. अब मुझे ठीक ठीक अपनी जन्नत का द्वार दिखाई दे रहा था.. गहरे लाल और गुलाबी रंग में रंगा 'वो' कोई आधा इंच गहरा एक गड्ढा सा था...

मुझे पता था की जब भी मेरा 'कल्याण' होगा.. यहीं से होगा...! जहाँ से चूत की फांकें अलग होनी शुरू होती हैं.. वहाँ पर एक छोटा सा दाना उभरा हुआ था.. ठीक मेरी चूचियों के दाने की तरह.. उत्तेजना के मारे पागल सी होकर में उसको उंगली से छेदने लगी..

हमेशा की तरह वहाँ स्पर्श करते ही मेरी आँखें बंद होने लगी.. जाँघों में हल्का हल्का कंपन सा शुरू हो गया... वैसे ये सब मैं पहले भी महसूस कर चुकी थी.. पर सामने शीशे में देखते हुए ऐसा करने में अलग ही रोमांच और आनंद आ रहा था..

धीरे धीरे मेरी उँगलियों की गति बढ़ती गयी.. और मैं निढाल होकर बिस्तर पर पीछे आ गिरी ... उंगलियाँ अब उसको सहला नहीं रही थी... बल्कि बुरी तरह से पूरी चूत को ही फांकों समेत मसल रही थी... अचानक मेरी अजीब सी सिसकियों से मेरे कानों में मीठी सी धुन गूंजने लगी और न जाने कब ऐसा करते हुए मैं सब कुछ भुला कर दूसरे ही लोक में जा पहुंची....

गहरी सांसें लेते हुए मैं अपने सारे शरीर को ढीला छोड़ बाहों को बिस्तर पर फैलाये होश में आने ही लगी थी की दरवाजे पर दस्तक सुनकर मेरे होश ही उड़ गये....


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 12:01 PM

मैंने फटाफट उठते हुए स्कर्ट को अच्छी तरह नीचे किया और जाकर दरवाजा खोल दिया....

"कितनी देर से नीचे से आवाज लगा रहा हूँ? मैं तो वापस जाने ही वाला था...अच्छा हुआ जो उपर आकर देख लिया... " सामने जमींदार का लड़का खड़ा था; सुन्दर!

" क्या बात है? आज स्कूल नहीं गयी क्या?" सुन्दर ने मुझे आँखों ही आँखों में ही मेरे गालों से लेकर घुटनों तक नाप दिया..

"घर पर कोई नहीं है!" मैंने सिर्फ इतना ही कहा और बाहर निकल कर आ गयी...

कमीना अंदर जाकर ही बैठ गया,"तुम तो हो न!"

"नहीं... मुझे भी अभी जाना है.. खेत में..!" मैंने बाहर खड़े खड़े ही बोला...

"इतने दिनों में आया हूँ.. चाय वाय तो पूछ लिया करो.. इतना भी कंजूस नहीं होना चाहिए..."

मैंने मुड़कर देखा तो वो मेरे मोटे चूतड़ों की और देखते हुए अपने होंठों पर जीभ फेर रहा था....

"दूध नहीं है घर में...!" मैं चूतड़ों का उभर छुपाने के लिये जैसे ही उसकी और पलटी.. उसकी नजरें मेरे सीने पर जम गयी

"कमाल है.. इतनी मोटी ताजी हो और दूध बिल्कुल नहीं है.." वह दांत निकल कर हँसने लगा...

आप शायद समझ गये होंगे की वह किस 'दूध' की बात कर रहा था.. पर मैं बिल्कुल नहीं समझी थी उस वक्त.. तुम्हारी कसम

"क्या कह रहे हो? मेरे मोटी ताज़ी होने से दूध होने या न होने का क्या मतलब"

वह यूँही मेरी साँसों के साथ उपर नीचे हो रही मेरी छातीयों को घूरता रहा," इतनी बच्ची भी नहीं हो तुम.. समझ जाया करो.. जितनी मोटी ताज़ी भैंस होगी.. उतना ही तो ज्यादा दूध देगी" उसकी आँखें मेरे बदन में गड़ी जा रही थी...

हाय राम! मेरी अब समझ में आया वो क्या कह रहा था.. मैंने पूरा जोर लगाकर चेहरे पर गुस्सा लाने की कोशिश की.. पर मैं अपने गालों पर आये गुलाबीपन को छुपा न सकी," क्या बकवास कर रहे हो तुम...? मुझे जाना है.. अब जाओ यहाँ से..!"

"अरे.. इसमें बुरा मानने वाली बात कौन सी है..? ज्यादा दूध पीती होगी तभी तो इतनी मोटी ताज़ी हो.. वरना तो अपनी दीदी की तरह दुबली पतली न होती....और दूध होगा तभी तो पीती होगी...मैंने तो सिर्फ उदाहरण दिया था.. मैं तुम्हे भैंस थोड़े ही बोल रहा था... तुम तो कितनी प्यारी हो.. गोरी चिट्टी... तुम्हारे जैसी तो और कोई नहीं देखी मैंने... आज तक! कसम झंडे वाले बाबा की..."

आखिरी लाइन कहते कहते उसका लहजा पूरा कामुक हो गया था.. जब जब उसने दूध का जिकर किया.. मेरे कानों को यही लगा की वो मेरी मदभरी छातीयों की तारीफ़ कर रहा है....

"हाँ! पीती हूँ.. तुम्हे क्या? पीती हूँ तभी तो खत्म हो गया.." मैंने चिड कर कहा....

"एक आध बार हमें भी पिला दो न!... .. कभी चख कर देखने दो.. तुम्हारा दूध...!"

उसकी बातों के साथ उसका लहजा भी बिल्कुल अश्लील हो गया था.. खड़े खड़े ही मेरी टाँगे कांपने लगी.....

"मुझे नहीं पता...मैंने कहा न.. मुझे जाना है..!" मैं और कुछ न बोल सकी और नजरें झुकाये खड़ी रही..

"नहीं पता तभी तो बता रहा हूँ अंजु! सीख लो एक बार.. पहले पहल सभी को सीखना पड़ता है... एक बार सीख लिया तो जिंदगी भर नहीं भूलोगी..." उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे तैर रहे थे...

मेरा भी बुरा हाल हो चूका था तब तक.. पर कुछ भी हो जाता.. उस के नीचे तो मैंने न जाने की कसम खा रखी थी.. मैंने गुस्से से कहा,"क्या है? क्या सीख लूं.. बकवास मत करो!"

"अरे.. इतना उखाड़ क्यूँ रही हो बार बार... मैं तो आये गये लोगों की मेहमान-नवाजी सीखाने की बात कर रहा हूँ.. आखिर चाय पानी तो पूछना ही चाहिए न.. एक बार सीख गयी तो हमेशा याद रखोगी.. लोग कितने खुश होकर वापस जाते हैं.. ही ही ही !" वह खींसे निपोरता हुआ बोला... और चारपाई के सामने पड़ी मेरी कच्छी को उठा लिया...

मुझे झटका सा लगा.. उस और तो मेरा ध्यान अब तक गया ही नहीं था... मुझे न चाहते हुए भी उसके पास अंदर जाना पड़ा,"ये मुझे दो...!"

बड़ी बेशर्मी से उसने मेरी गीली कच्छी को अपनी नाक से लगा लिया,"अब एक मिनट में क्या हो जायेगा.. अब भी तो बेचारी फर्श पर ही पड़ी थी..." मैंने हाथ बढाया तो वो अपना हाथ पीछे ले गया.. शायद इस ग़लतफ़हमी में था की उससे छीनने के लिये में उसकी गोद में चढ़ जाउंगी....

मैं पागल सी हो गयी थी.. उस पल मुझे ये ख्याल भी नहीं आया की मैं बोल क्या रही हूँ..," दो न मुझे... मुझे पहननी है..." और अगले ही पल ये अहसास होते ही की मैंने क्या बोल दिया.. मैंने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद करके अपने चेहरे को ढक लिया....

"ओह हो हो हो... इसका मतलब तुम नंगी हो...! जरा सोचो.. कोई तुम्हे जबरदस्ती लिटा कर तुम्हारी 'वो देख' ले तो!"

उसके बाद तो मुझसे वहाँ खड़ा ही नहीं रहा गया.. पलट कर मैं नीचे भाग आई और घर के दरवाजे पर खड़ी हो गयी.. मेरा दिल मेरी अकड़ चुकी छातीयों के साथ तेजी से धक धक कर रहा था...


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 12:02 PM

कुछ ही देर में वह नीचे आया और मेरी बराबर में खड़ा होकर बिना देखे बोला," स्कूल में तुम्हारे करतबों के काफी चर्चे सुने हैं मैंने.. वहाँ तो बड़ी फ़ुदकती है तू... याद रखना छोरी.. तेरी माँ को भी चोदा है मैंने.. पता है न...? आज नहीं तो कल.. तुझे भी अपने लंड पर बिठा कर ही रहूँगा..." और वो निकल गया...

डर और उत्तेजना का मिश्रण मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रहा था... मैंने दरवाजा झट से बंद किया और बदहवास सी भागते भागते उपर आ गयी... मुझे मेरी कच्छी नहीं मिली.. पर उस वक्त कच्छी से ज्यादा मुझे "कच्छी वाली" की फिकर थी.. उपर वाला दरवाजा बंद किया और शीशे के सामने बैठकर मैं जांघें फैलाकर अपनी चूत को हाथ से मसलने लगी.......

उसके नाम पर मत जाना... वो कहते हैं न! आँख का अँधा और नाम नयनसुख... सुन्दर बिल्कुल ऐसा ही था.. एक दम काला कलूटा.. और 6 फीट से भी लंबा और तगड़ा सांड! मुझे उससे घिन तो थी ही.. डर भी बहुत लगता था.. मुझे तो देखते ही वह ऐसे घूरता था जैसे उसकी आँखों में X-ray लगा हो और मुझको नंगी करके देख रहा हो... उसकी जगह और कोई भी उस समय उपर आया होता तो मैं उसको प्यार से अंदर बिठा कर चाय पिलाती और अपना अंग-प्रदर्शन अभियान चालु कर देती... पर उससे तो मुझे इस दुनिया में सबसे ज्यादा नफरत थी...

उसका भी एक कारण था..


RE: कामांजलि - Rapidshare - 10-02-2010 12:02 PM

कुछ साल पहले की बात है.. . मम्मी कोई 30 के करीब होगी और वो हरामजादा सुन्दर 20 के आस पास. लंबा तो वो उस वक्त भी इतना ही था, पर इतना तगड़ा नहीं....

सर्दियों की बात है... मैं उस वक्त अपनी दादी के पास नीचे ही सोती थी... नीचे तब तक कोई अलग कमरा नहीं था... 18 x 30 की छत के नीचे सिर्फ उपर जाने के लिये जीना बना हुआ था...रात को उनसे रोज राजा-रानी की कहानियां सुनती और फिर उनके साथ ही दुबक जाती... जब भी पापा मार पीट करते थे तो मम्मी नीचे ही आकर सो जाती थी.. उस रात भी मम्मी ने अपनी चारपाई नीचे ही डाल ली थी...हमारा दरवाजा खुलते समय काफी आवाज करता था... दरवाजा खुलने की आवाज से ही शायद में उनींदी सी हो गयी ...

"मान भी जा अब.. 15 मिनट से ज्यादा नहीं लगाऊंगा..." शायद यही आवाज आई थी.. मेरी नींद खुल गयी.. मरदाना आवाज के कारण पहले मुझे लगा की पापा हैं.. पर जैसे ही मैंने अपनी रजाई में से झाँका; मेरा भ्रम टूट गया.. नीचे अँधेरा था.. पर बाहर स्ट्रीट लाइट होने के कारण धुंधला धुंधला दिखाई दे रहा था...

"पापा तो इतने लंबे हैं ही नहीं..!" मैंने मन ही मन सोचा...

वो मम्मी को दीवार से चिपकाये उससे सटकर खड़ा था.. मम्मी अपना मौन विरोध अपने हाथों से उसको पीछे धकेलने की कोशिश करके जता रही थी...

"देख चाची.. उस दिन भी तूने मुझे ऐसे ही टरका दिया था.. मैं आज बड़ी उम्मीद के साथ आया हूँ... आज तो तुझे अपनी देनी ही पड़ेगी..!" वो बोला.....

"तुम पागल हो गये हो क्या सुन्दर? ये भी कोई टाइम है...तेरा चाचा मुझे जान से मार देगा..... तुम जल्दी से 'वो' काम बोलो जिसके लिये तुम्हे इस वक्त आना जरूरी था.. और जाओ यहाँ से...!" मम्मी फुसफुसाई...

"काम बोलने का नहीं.. करने का है चाची.. इश्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.." सिसकी सी लेकर वो वापस मम्मी से चिपक गया...

उस वक्त मेरी समझ में नहीं आ रहा था की मम्मी और सुन्दर में ये छीना झपटी क्यूँ हो रही है...मेरा दिल दहकने लगा... पर मैं डर के मारे सांस रोके सब देखती और सुनती रही...

"नहीं.. जाओ यहाँ से... अपने साथ मुझे भी मरवाओगे..." मम्मी की खुसफुसाहट भी उनकी सुरीली आवाज के कारण साफ़ समझ में आ रही थी....

"वो लंडरु मेरा क्या बिगाड़ लेगा... तुम तो वैसे भी मरोगी अगर आज मेरा काम नहीं करवाया तो... मैं कल उसको बता दूँगा की मैंने तुम्हे बाजरे वाले खेत में अनिल के साथ पकड़ा था...." सुन्दर अपनी घटिया सी हँसी हँसने लगा....

"मैं... मैं मना तो नहीं कर रही सुन्दर... कर लूंगी.. पर यहाँ कैसे करूँ... तेरी दादी लेटी हुई है... उठ गयी तो?" मम्मी ने घिघियाते हुए विरोध करना छोड़ दिया....

"क्या बात कर रही हो चाची? इस बुढिया को तो दिन में भी दिखाई सुनाई नहीं देता कुछ.. अब अँधेरे में इसको क्या पता लगेगा..." सुन्दर सच कर रहा था....

"पर छोटी भी तो यहीं है... मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ..." मम्मी गिडगिडाई...

"ये तो बच्ची है.. उठ भी गयी तो इसकी समझ में क्या आयेगा? वैसे भी ये तुम्हारी लाडली है... बोल देना किसी को नहीं बताएगी... अब देर मत करो.. जितनी देर करोगी.. तुम्हारा ही नुकसान होगा... मेरा तो खड़े खड़े ही निकलने वाला है... अगर एक बार निकल गया तो आधे पौने घंटे से पहले नहीं छूटेगा.. पहले बता रहा हूँ..."

मेरी समझ में नहीं आ रहा था की ये 'निकलना' छूटना' क्या होता है.. फिर भी मैं दिलचस्पी से उनकी बातें सुन रही थी.......

"तुम परसों खेत में आ जाना.. तेरे चाचा को शहर जाना है... मैं अकेली ही जाउंगी.. समझने की कोशिश करो सुन्दर.. मैं कहीं भागी तो नहीं जा रही....." मम्मी ने फिर उसको समझाने की कोशिश की....

"तुम्हे मैं ही मिला हूँ क्या? चुतिया बनाने के लिये... अनिल बता रहा था की उसने तुम्हारी उसके बाद भी 2 बार मारी है... और मुझे हर बार टरका देती हो... परसों की परसों देखेंगे.... अब तो मेरे लिये तो एक एक पल काटना मुश्किल हो रहा है.. तुम्हे नहीं पता चाची.. तुम्हारे गोल गोल पुट्ठे (चूतड़) देख कर ही जवान हुआ हूँ.. हमेशा से सपना देखता था की किसी दिन तुम्हारी चिकनी जाँघों को सहलाते हुए तुम्हारी रसीली चूत चाटने का मौका मिले.. और तुम्हारे मोटे मोटे चूतड़ों की कसावट को मसलता हुआ तुम्हारी गांड में ऊँगली डाल कर देखूं.. सच कहता हूँ, आज अगर तुमने मुझे अपनी मारने से रोका तो या तो मैं नहीं रहूँगा... या तुम नहीं रहोगी.. लो पकड़ो इसको..."

अब जाकर मुझे समझ में आया की सुन्दर मम्मी को 'गंदी' बात करने के लिये कह रहा है... उनकी हरकतें इतनी साफ़ दिखाई नहीं दे रही थी... पर ये जरूर साफ़ दिख रहा था की दोनों आपस में गुत्थम गुत्था हैं... मैं आँखें फाड़े ज्यादा से ज्यादा देखने की कोशिश करती रही....



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